विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता
कोई अधूरा पूरा नहीं होता
कोई अधूरा पूरा नहीं होता
और एक नया शुरू होकर
नया अधूरा छूट जाता
शुरू से इतने सारे
कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते
परंतु इस असमाप्त –
अधूरे से भरे जीवन को
पूरा माना जाए, अधूरा नहीं
कि जीवन को भरपूर जिया गया
इस भरपूर जीवन में
मृत्यु के ठीक पहले भी मैं
एक नई कविता शुरू कर सकता हूं
मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह
जीवन की अपनी पहली कविता की तरह
किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
विनोद जी अप्रतिम है.. मगर उनकी कविता अधिक निखरती है उनके गद्य लेखन में.. उनके उपन्यासों में..
Comment by अभय तिवारी — July 20, 2007 @ 6:41 am
बहुत खूब!!
आभार!!
Comment by Sanjeet Tripathi — July 20, 2007 @ 8:00 am
अब जाकर ब्लॉग की दुनिया अपनी लगी है
Comment by बोधिसत्व — July 20, 2007 @ 8:15 am
बहुत अच्छी कविता है। विनोद जी मेरे प्रिय कवि और लेखक हैं। उनसे रायपुर में 4-5 बार मिल भी चुका हूँ। मैं स्वयं भी रायपुर का ही हूँ।
Comment by सोमेश सक्सेना — July 20, 2007 @ 8:29 am
विनोद जी की कविता अद्भुत होती है । शुक्रिया इस कविता के लिए । मुझे उनकी ‘अधिक कुछ नहीं’ कविता बहुत पसंद है ।
Comment by yunus — July 20, 2007 @ 12:38 pm
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Comment by vinod kumar — April 28, 2008 @ 5:39 am