न देने के वास्ते
अमिताभ गुप्त की एक बांग्ला कविता
( अनुवाद: सुमना मजूमदार; पुनरीक्षण: प्रियंकर )
न देने के वास्ते
तुम पर निछावर कर दूंगा
मायावी देह का सौन्दर्य
तुम्हारे आंचल में छोड़ जाऊंगा
जादू भरे तेजस्वी प्राण
कुहासे को चीर कर आई भोर
नन्हीं बच्ची की तरह छोटे-छोटे हाथों से
इस भोर ने – पूरे बंगाल की भोर ने
नदी को आगोश में ले लिया
इस भोर की तरह
लजीला करुण प्रेम
छोड़ जाऊंगा मैं
तुम्हारी भावनाओं में
– उसके बाद सूरज बड़ा होगा
एक रोज़ भोर खत्म नहीं होगी
एक रोज़ सूरज नहीं ढलेगा
एक रोज़ बिटिया के दिल में
खिल उठेगी आकाश की हंसी ।
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( काव्य संकलन ‘कल्पना एबंग एकाकीर किंबदंती’ से साभार )
बहुत अच्छी कविता है। इस कविता में बंगाल की शव्द संयोजना साफ साफ देखी जा सकती है।
भाई क्या कभी बनलता सेन भी पड़ने को मिल सकेगी
Comment by बोधिसत्व — July 24, 2007 @ 10:49 am
ठीक कहा आपने . आपकी पसंद की कविता ज़रूर मिलेगी . थोड़ा समय दें .
Comment by प्रियंकर — July 24, 2007 @ 11:55 am
एक रोज़ बिटिया के दिल में
खिल उठेगी आकाश की हंसी । आमीन!
Comment by अनूप शुक्ल — July 24, 2007 @ 4:43 pm