न देने के लिये
{ कल इस बांग्ला कविता का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया था,प्रस्तुत है इसी कविता का एक और अनुवाद ताकि आप दोनों अनुवादों की तुलना कर सकें. कृपया बताएं कि आपको कौन-सा अनुवाद अधिक पसंद आया और क्यों . अनुवादक-पुनरीक्षक वही हैं }
अमिताभ गुप्त की एक बांग्ला कविता
( अनुवाद: सुमना मजूमदार; पुनरीक्षण: प्रियंकर )
न देने के लिये
तुम पर मायावी देह का
सौन्दर्य निछावर कर दूंगा
तुम्हारे आंचल में छोड़ जाऊंगा
जादू भरे तेजस्वी प्राण
कुहासे को चीर कर आई भोर
नन्हीं बच्ची की तरह
छोटे-छोटे हाथों से
इस भोर ने
नदी को आगोश में ले लिया
– पूरे बंगाल की भोर ने
इस भोर की तरह
लजीला करुण प्रेम
छोड़ जाऊंगा मैं
तुम्हारी भावनाओं में
– उसके बाद सूरज बड़ा होगा
एक रोज़ भोर खत्म नहीं होगी
एक रोज़ सूरज नहीं ढलेगा
एक रोज़ बिटिया के दिल में
खिल उठेगी आकाश की हंसी ।
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( काव्य संकलन ‘कल्पना एबंग एकाकीर किंबदंती’ से साभार )