Posted by: PRIYANKAR | July 27, 2007

कुंवर नारायण की एक कविता

कभी पाना मुझे

 

तुम अभी आग ही आग

मैं बुझता चिराग

 

हवा से भी अधिक अस्थिर हाथों से

पकड़ता एक किरण का स्पन्द

पानी पर लिखता एक छंद

बनाता एक आभा-चित्र

 

और डूब जाता अतल में

एक सीपी में बंद

 

कभी पाना मुझे

सदियों बाद

दो गोलार्धों के बीच

झूमते एक मोती में ।

 

*******

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय‘ अंक से साभार )

 


Responses

  1. अतीव सुन्दर ! धन्यवाद

  2. खुबसूरत्

  3. बहुत खूबसूरत है

  4. बहुत सुन्दर.वाह!!

  5. सुंदर!!

  6. कुंवर जी मेरे पसंद के एक कवि हैं। उन्हे पढ़ना सदा अच्छा लगता है


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