राजकिशोर की एक कविता
साथ
तुम्हारी साड़ी की किनारी लाल है
अरे, मैंने पहली बार देखा आज
मैं तो इसके पीले फूलों का
आदी हो चला था
यह लो
तुम्हारे कुछ बाल सफ़ेद हो चले
पीछे की ओर
जूड़े के नीचे
और यह कनपटी के पास
हल्की-सी कालिमा
बिलकुल ताज़ा तो नहीं लगती
फ़िर यह कल तक कहां थी
जबकि यह मेरे प्यार करने की
प्रिय जगहों में है
जब बाहर इतना कुछ नहीं देख पाया
तो भीतर
पता नहीं कितना कुछ जमा होगा
इन पंद्रह-बीस वर्षों में
मेरे दृष्टि-पथ से परे
उफ़, मैं तुम्हारे साथ नहीं
तो किसके साथ रह रहा था ।
******
( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )