साथ
तुम्हारी साड़ी की किनारी लाल है
अरे, मैंने पहली बार देखा आज
मैं तो इसके पीले फूलों का
आदी हो चला था
यह लो
तुम्हारे कुछ बाल सफ़ेद हो चले
पीछे की ओर
जूड़े के नीचे
और यह कनपटी के पास
हल्की-सी कालिमा
बिलकुल ताज़ा तो नहीं लगती
फ़िर यह कल तक कहां थी
जबकि यह मेरे प्यार करने की
प्रिय जगहों में है
जब बाहर इतना कुछ नहीं देख पाया
तो भीतर
पता नहीं कितना कुछ जमा होगा
इन पंद्रह-बीस वर्षों में
मेरे दृष्टि-पथ से परे
उफ़, मैं तुम्हारे साथ नहीं
तो किसके साथ रह रहा था ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
वाह क्या कविता है।
By: अनूप शुक्ल on जुलाई 30, 2007
at 7:12 पूर्वाह्न
बढिया
By: प्रत्यक्षा on जुलाई 30, 2007
at 7:57 पूर्वाह्न
सवाल का जवाब भी दीजिए, राजकिशोरजी !
By: afloo on जुलाई 30, 2007
at 7:59 पूर्वाह्न
अलग बानक की कविता है। पर ये तमाम स्वर हिंदी में उपेक्षित क्यों हैं।
By: बोधिसत्व on जुलाई 30, 2007
at 8:19 पूर्वाह्न
व्यक्ति जहाँ होता है पूरी तरह वहाँ होता नहीं .ध्यान यही सिखाता है. हम जहाँ है पूरी तरह वहाँ हों तो ये नौबत नहीं आयेगी.
By: बसंत आर्य on जुलाई 30, 2007
at 10:32 पूर्वाह्न
बहुत गहरी!!
By: समीर लाल on जुलाई 30, 2007
at 2:42 अपराह्न
कविता बहुत अच्छी लगी.आप का चयन बहुत बढ़िया है.
By: rajni,bhargava on जुलाई 30, 2007
at 3:51 अपराह्न