अनहद नाद

July 30, 2007

राजकिशोर की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:53 am

 

साथ

 

तुम्हारी साड़ी की किनारी लाल है

अरे, मैंने पहली बार देखा आज

मैं तो इसके पीले फूलों का

आदी हो चला था

 

यह लो

तुम्हारे कुछ बाल सफ़ेद हो चले

पीछे की ओर

जूड़े के नीचे

 

और यह कनपटी के पास

हल्की-सी कालिमा

बिलकुल ताज़ा तो नहीं लगती

फ़िर यह कल तक कहां थी

जबकि यह मेरे प्यार करने की

प्रिय जगहों में है

 

जब बाहर इतना कुछ नहीं देख पाया

तो भीतर

पता नहीं कितना कुछ जमा होगा

इन पंद्रह-बीस वर्षों में

मेरे दृष्टि-पथ से परे

 

उफ़, मैं तुम्हारे साथ नहीं

तो किसके साथ रह रहा था ।

 

******

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

7 Comments »

  1. वाह क्या कविता है।

    Comment by अनूप शुक्ल — July 30, 2007 @ 7:12 am

  2. बढिया

    Comment by प्रत्यक्षा — July 30, 2007 @ 7:57 am

  3. सवाल का जवाब भी दीजिए, राजकिशोरजी !

    Comment by afloo — July 30, 2007 @ 7:59 am

  4. अलग बानक की कविता है। पर ये तमाम स्वर हिंदी में उपेक्षित क्यों हैं।

    Comment by बोधिसत्व — July 30, 2007 @ 8:19 am

  5. व्यक्ति जहाँ होता है पूरी तरह वहाँ होता नहीं .ध्यान यही सिखाता है. हम जहाँ है पूरी तरह वहाँ हों तो ये नौबत नहीं आयेगी.

    Comment by बसंत आर्य — July 30, 2007 @ 10:32 am

  6. बहुत गहरी!!

    Comment by समीर लाल — July 30, 2007 @ 2:42 pm

  7. कविता बहुत अच्छी लगी.आप का चयन बहुत बढ़िया है.

    Comment by rajni,bhargava — July 30, 2007 @ 3:51 pm

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