अनहद नाद

July 18, 2007

त्रिलोचन : ( वागर्थ के जुलाई-07 अंक से साभार )

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:49 am

बोधिसत्व की एक कविता

 

त्रिलोचन

 

‘सुनने में आया, हैं बीमार त्रिलोचन

हरिद्वार में पड़े हैं, अपने बेटे के पास

जिनका कविता-फ़विता से कोई

लेना-देना नहीं है। टूट गई है जीभ,  जो मन सो

बकते से हैं, जसम-फ़सम, जलेस-प्रलेस सब

सकते में हैं’

खबर सुनाई जिसने कवि-अध्यापक वह

इलाहाबाद-अवध में चर्चा है व्यापक कह

मौन हुआ, मैं रहा देखता उसका मुंह

रात बहुत थी काली, जम्हाता अंगुली

पटकाता वह फिर बोला –

‘सूतो अब तुम भी’

मैंने मन ही मन कहा –

‘त्रिलोचन घनी छांव वाला तरुवर है

मूतो अब तुम भी’

उस पर विचार के नाम पर

दुर-दुर करो, कहो वाम पर

धब्बा है त्रिलोचन

कहो त्रिलोचन कलंक है।

भूल जाओ कि वह जनपद का कवि है

गूंज रहा है उसके स्वर से दिग-दिगंत है।

 

मरने दो उसको दूर देश में पतझड़ में

तुम सब चहको भड़ुओं तुम्हारा तो

हर दिन बसंत है।

 

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अपने त्रिलोचन जी आज की हिंदी के शिखर कवि त्रिलोचन का जन्म 20 अगस्त 1917 को चिरानीपट्टी, कटघरापट्टी, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। अंग्रेजी में एम.ए.पूर्वार्ध तक की पढ़ाई बीएचयू से । इनकी दर्जनों कृतियाँ प्रकाशित हैं जिनमें धरती(1945), गुलाब और बुलबुल(1956), दिगंत(1957), ताप के ताए हुए दिन(1980), शव्द(1980), उस जनपद का कवि हूँ (1981) अरधान (1984), तुम्हें सौंपता हूँ( 1985) काफी महत्व रखती हैं। इनका अमोला नाम का एक और महत्वपूर्ण संग्रह है। त्रिलोचन की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह राजकमल प्रकाशन से छप चुका है। वरिष्ठ कवि केदार नाथ सिंह के शव्दों में “उनका जितना प्रकाशित है उतना या कदाचित उससे अधिक ही अप्रकाशित है”।हिंदी में सॉनेट जैसी काव्य विधा को स्थापित करने का श्रेय मात्र त्रिलोचन को ही जाता है। आप त्रिलोचन को आत्मपरकता कवि भी मान सकते हैं। ‘भीख माँगते उसी त्रिलोचन को देखा कल’ जैसी आत्मपरक पंक्तियाँ त्रिलोचन ही लिख सकते हैं। परंतु ऐसा नहीं है कि त्रिलोचन का काव्य संसार केवल आत्मपरकता तक ही सीमित है। शब्दों का सजग प्रयोग त्रिलोचन की भाषा का प्राण है । –  बोधिसत्व

July 17, 2007

वृक्ष वे कविताएं हैं ….

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:45 am

खलील जिब्रान का गद्य-काव्य

 

वृक्ष वे कविताएं हैं,जिन्हें धरती आसमान पर लिखती है! हम उन्हें गिरा देते हैं और उनका कागज़ के रूप में परिवर्तन कर देते हैं,ताकि अपनी रिक्तता को उस पर अंकित कर सकें .

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यदि मुझे कविता लिखने की शक्ति या अलिखित कविता के आनंद में से कोई एक चुनने के लिए कहा जाय तो मैं आनंद को चुन लूंगा . वस्तुतः वह अधिक सुंदर कविता है .

परंतु तुम और मेरे समस्त पड़ोसी एकमत हो कि मैं सदा ही बुरी वस्तु ही पसंद करता हूं .

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केवल अभिव्यक्त अभिमत ही कविता नहीं है,प्रत्युत वह एक गीत है जो सस्मित मुख से प्रवाहित होता है .

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कवि उस सिंहासन-च्युत अधिपति के समान है,जो अपने महलों की राख में बैठा उसमें से एक काल्पनिक महल बनाने का प्रयत्न करता है .

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कविता प्रसाद,पीड़ा और आश्चर्य  का समझौता है,जिसे लिखने के लिए शब्दकोश पर आश्रित रहना पड़ता है .

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कविता के लिए ‘विचार करना’ सबसे भारी अवरोधक है .

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महान गायक वह है, जो हमारे मौन भावों को गा सके . 

 

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खलील जिब्रान (1883-1931) : विश्वविख्यात लेखक,कवि,चित्रकार और दार्शनिक . सीरिया के माउंट लेबनान प्रांत में जन्म .  अरबी और अंग्रेज़ी में लेखन . ‘दि प्रोफ़ेट’ उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना मानी जाती है . बलिष्ठ कल्पना-शक्ति के कवि खलील जिब्रान गद्य-काव्य की एक नई शैली के उन्नायक थे . वे उस परम्परा के कवि थे जिससे सूफ़ी-संत-मनीषी और ज्ञानी जन आते हैं .

July 16, 2007

दियना

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:59 am

Bhavani bhai 

‘कविता के गांधी’  भवानी भाई की एक लोकरंगी कविता

 

दियना

 

छांटी माटी की परिपाटी

ढेला बना उजेला रे

 

बियाबान जंगल में माटी

ऊंची नीची गहरी घाटी

काटी सो माटी

लोहे से नेही

किया झमेला रे

 

माटी खोदी भर-भर गोदी

सींची जी के जल से

राते हाथों गाते-गाते

राचा दिया नवेला रे

 

फेंक दिया आगी में दियना

झक-झक बाहर आया

जुगों-जुगों से पड़ा हुआ हूं

बाहर पका-पकाया

बाती डालो नेह भरो रे

माटी हूं प्रकाश करो रे

सईं सांझ सिलगा दो साजन

जलूं अकेला रे !

 

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भवानी भाई (१९१३-१९८५) की यह अप्रकाशित कविता मित्र लक्ष्मण केडिया (सम्पादक : भवानीप्रसाद मिश्र के आयाम)  को वर्ष १९९४ में भवानी भाई के अनन्य प्रशंसक श्री रामेश्वर मालवीय से प्राप्त हुई थी . यह कविता कवि के किसी भी संग्रह में सम्मिलित नहीं थी और अप्रकाशित थी . इसे मैंने ‘दर्पण’ के सितम्बर २००० अंक में पहली बार प्रकाशित किया था  और इसकी प्रति अनुपम जी को भी दी थी .

July 13, 2007

अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:40 am

जीवन वृत्तांत

 

उठाया ही था पहला कौर

कि पगहा तुड़ाकर भैंस भागी कहीं और

 

पहुंचा ही था खेत में पानी

कि छप्पर में आग लगी,बिटिया चिल्लानी

 

आरंभ ही किया था गीत का बोल

कि ढोलकिया के अनुसार फूट गया ढोल

 

घी का था बर्तन और गोबर की घानी

चाय जैसा पानी पिया, चाय जैसा पानी

 

मित्रों ने मेहनत से बनाई ऐसी छवि

चटक और दबावदार कविता का कवि

 

एक हाथ जोड़ा तो टूट गया डेढ़ हाथ

यही सारा जीवन वृत्तांत रहा दीनानाथ !

 

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( समकालीन सृजन   के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

July 12, 2007

तिल का ताड़, झूलता झोपड़ा और सुनहला पहाड़

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 8:42 am

उर्फ़ जाना जीवन से आनंद का ……..

सो एक आभासी मित्र सशरीर अवतरित हुए . आदमी का आदमी से मिलना और खुश होना अपने आप में एक रूमान है . हम भी थोड़ा- बहुत रूमानी हुए . हुए इसलिए कि  आजकल होना पड़ता है .जीवन में सहज रूमान बचा कहां है . कहां गम्भीरता का लहराता अगम-अगाध सागर और उस पर  गरजते- घहराते सिनिसिज़्म के बादल और कहां रूमान  का सूचिका-संधान . यह बेमौसम बरसात थी . एकदम गलत टाइमिंग . पर जीवन में टाइमिंग, टाइम-सैटिंग  या कहूं जितने भी तरह की सैटिंग हो सकती है,ठीक रखी होती तो फिर यह ब्लॉगरी ही रह गई थी करने को .

सो एक मित्र अवतरित हुए . हम रूमानी हुए .  रूमान की तरंग में कुछ लिख मारा . पढ़कर कुछ मित्र हमसे भी ज्यादा रूमानी हुए . इतने हुए कि भाव-विभोर हो गए . न जाने क्या-क्या अटरम-सटरम लिख मारा . आगमनकारी मित्र के सुनाम और सम्पर्क, जिसे आज की ‘पारलेंस’ में नेटवर्किंग भी कहा जाता है, का ही सुपरिणाम रहा होगा वरना अपना रूमान-रोग या रोगी-रूमान इतना संक्रामक कहां .

पर कुछ रूमान-विरोधी गंभीर मित्र बहुत नाराज़ हुए . लानतें भेजी . दो साधारण आदमियों के चिरकुटीय किस्म के मिलन को रूमान के घिस्से मार कर इतना चमकाने के लिए थू-थू की . अब उन्हें कौन समझाए कि ब्रासो रगड़ने और चमकाने के बाद भी पीतल, पीतल ही रहता है सोना थोड़े ही हो जाता है . ऊपरी दुष्ट मन कुनमुनाया   कि सीधे नारद के सुपरस्टार को शिकायत लिख भेजो ताकि वे इनके पीछे अपने अनुयाइयों की हल्ला-बोल मंडली  उर्फ़ तुनतुनिया ब्रिगेड  को लगा दें . या फिर डायरेक्ट अविनाश या राहुल को सुपारी दे  दो . पर  समस्या यह है कि ये रूमान-विरोधी गंभीर-सिनिकल जीव  इतने प्यारे लोग हैं कि लगभग अपना आत्मरूप लगते हैं .  अब अपने आप से दुश्मनी कौन मोल ले .

मेरी समस्या यह है कि मुझे स्माइली लगाना नहीं आता और इनकी समस्या यह है कि ये या तो पोस्ट के नीचे का नोट नहीं पढते या इनकी फ़ुल-टाइम गंभीरता का इरेज़र उस स्माइली को इरेज़ करता चलता है . सुपरस्टार कहना तारीफ़ करना भी होता है और जिम्मेदार ठहराना भी . सुपरस्टार कहना सीधा प्रशस्तिगान भी हो सकता है ,  वक्रोक्ति भी और व्याजस्तुति भी . पर जो भी है या हो सकता है , है स्माइली के साथ . और इसे स्माइली के साथ ही पढा जाना चाहिए . अच्छा यह लगा कि अधिकांश ने इसे स्माइली के साथ पढा भी . पर गुरु-गंभीर लोग प्रचलित पथ पर नहीं चलते . सायर,सिंह,सपूत की परम्परा में वे लीक छोड़कर चलते हैं . नए मार्ग इसी तरह से बनते हैं . कई बार तो वे प्रचलित मार्ग से ज्यादा दुर्गम और बीहड़ होते हैं . पर होते हैं नए .

तो साहेबान! तिल का ताड़ बनाने.. झूलते झोंपड़े का ताज़महल और सुनहला पहाड़ बनाने का दोषी हूं .  बुखार सच में अभी तक उतरा नहीं लगता है . भावुकता में नहाया सिलबिल प्रजाति का जीव और  इस विराट भूमंडलीय बाज़ार  का बचा हुआ अनबिका ‘लास्ट रिजेक्टेड पीस’  हूं .

जयपुर में मेरे एक मित्र हैं . कॉलेज के जमाने के मित्र . मित्र तो स्कूल-कॉलेज के जमाने के ही होते हैं,बाद में तो शायद धरम-धक्के के तहत आस-पास धकेल दिए गए लोगों की ‘वर्केबल’ व्यवस्था ही होती दिखती है ( सिनिसिज़्म के सागर में दो-चार गोते मुझे भी मारने दीजिए) . तो मेरे मित्र पं० हरिकिशन शर्मा उर्फ़ वकील साहब की प्लास्टिक थर्मोवेयर्स की एजेंसी है जिसे तीन भाई हरिकिशन,अशोक और राजीव उर्फ़ राजू मिल कर चलाते हैं . कोई सामान जो बहुत दिनों से पड़ा होता है और बिकता नहीं है उसे वे ‘ब्लॉक्ड आइटम’ या ‘ब्लॉक आइटम’ कहते हैं . राजू से मैंने इस शब्द का सर्वथा मौलिक उपयोग सीखा . जो व्यक्ति उसे पसंद नहीं आता था, या आलतू-फ़ालतू या फर्जी टाइप का लगता था, मुझे ’भोला आदमी’ समझ कर उस व्यक्ति के बारे में पूर्व-सूचना प्रदान करते हुए राजू के चेतावनी भरे शब्द होते थे, “गुरु जी! ऊंसे दूर रहो ‘ब्लॉक आइटम ‘ है .”  इस शब्द में उसने कितने और कैसे-कैसे अर्थ-आरोपित कर रखे थे उनमें से कुछ को मैं समझ पाता था और कुछ को नहीं . पर राजू की सूझ-बूझ को सराहता था और कुछ अपने भी अर्थ आरोपित करता था .मुझे इसमें ‘मानसिक अवरोध’ या ‘मेंटल ब्लॉक’ की भी ध्वनि तरंगित होती प्रतीत होती थी .

मैं बहुत खराब रसोइया हूं . मेरी दाल हमेशा ज्यादा पक जाती है (दाल गल जाती है नहीं कहूंगा वरना और ही अर्थ-छवि उठने लगेगी). खाली रसोइया क्या, मैं सब-कुछ ही गड़बड हूं . राजू की शब्दावली में मैं एक ‘ब्लॉक आइटम’ हूं . पर सुधीजनो! आप तो इस चलायमान दुनिया के ‘चलेबल’  बल्कि     ‘दौड़ेबल’   लोग हैं, आप ‘ब्लॉक आइटम’ क्यों बनना चाहते हैं . चलिए थोड़ा रूमानी हो जाएं .

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नोट : स्माइली की एक खेप या लदनी यहीं पड़ी है . चाहनवारे मन-माफ़िक ‘व्यवहार’ कर सकते हैं .

July 9, 2007

आना फ़ुरसतिया का ….

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 2:10 pm

आना फ़ुरसतिया का और  लौटना एक आत्मीय मित्र का 

सप्ताह भर  से वाइरल दबोचे था .  मन-प्राण में एक अज़ब किस्म की विकलता थी .  अवचेतन में कहीं एक पुकार थी  कि    कोई मित्र आए  और मिज़ाज पुरसी करे .  थोडा धौल-धप्पा करे और कहे कि बहुत हुआ वाइरल का व्यसन, अब  उठो और थोड़ा काम-धाम शुरु करो . क्या आदमी हो जो इतने में पस्त हो गए . ऐसे में अनूप भाई का यह समाचार कि वे कोलकाता आ रहे हैं और मिलना-बतियाना होगा, खुदाई मेहर लगी .

अनूप शुक्ल यानी हिंदी के शीर्षस्थानीय – वरिष्ठतमेस्ट — ब्लॉगर के रूप में मशहूर नाम, नारद के संकटमोचक,  बेहतरीन किस्म के खिलंदड़े गद्य के सुलेखक और साहित्य के अनूठे आस्वादक और प्रस्तोता . जब तक यह  अनामदास, प्रमोद,ज्ञानदत्त और रवीश  का चौगड्डा नहीं अवतरित हुआ था, डायलॉग डिलीवरी के थोड़े-बहुत नुक्स के बावज़ूद हमारे नारदाकाश के एकमात्र सुपरस्टार –  नारद के अमिताभ बच्चन — वही थे .

संतुलन,समायोजन,समंजन और आसंजन का सबसे सुष्ठु एकाकार रूप देखना हो अनूप भाई को देख लीजिए .फिर कहीं और नज़र डालने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. ग्रियर्सन ने तुलसी के संदर्भ में, और बाद में शायद हज़ारी बाबू ने भी किसी संदर्भ में,  कहा था कि भारत में जननायक वही हो सकता है जो विविधताओं से भरे इस महादेश में समन्वय को साध सके . सो आभासी नारदालोक में समन्वय की सारी तरंगें कानपुर की अर्मापुर स्थित शक्तिपीठ में साधनारत अनूपाचार्य के जटा-जूट से ही निस्सृत होती है . नारद की वीणा पर जो भी राग बजता है उसकी स्वरलिपि प्रथमदृष्टया वही अनुमोदित करते हैं ; नारद घराने के नए,उभरते हुए और हर समय कुछ-न-कुछ तुनतुनाते रंगरूट गायक जो भी बंदिश गाते हैं उसके ‘सदारंग-अदारंग’ अपने अनूप भाई होते हैं . वाद्यवृंद — ऑरकेस्ट्रा — छोटा हो या बड़ा, वह बीथोवेन की सिंफ़नी बजाए या बप्पी लहड़ी-अनु मलिक छाप धांय-धूंय वाला ‘लिफ़्टेड’ कोलाहल, उसके ‘जुबीन मेहता’ अपने अनूप भाई ही होते हैं . नारदीय-दल में उनका वही स्थान है जो कांग्रेस में प्रणव मुखर्जी का,भाजपा में जसवंत सिंह का और समाजवादी  पार्टी में अमर सिंह का है . गद्दी से वंचित कुछ लोग उन्हें नारद के ब्लॉग-अखाड़े का पट्ठे पालनेवाला महंत भी कहते हैं . खैर मामला जो भी हो, वे नारद घराने के सबसे स्वीकृत-सम्मानित ‘वाग्गेयकार’ हैं  और  आभासी-जगत के नए  नारदीय-सूक्त के फ़ुरसतिया सूत्र एकदम स्पष्ट हैं .

तो ऐसे पण्डित अनूप सुकुल कोलकाता नगरी को पवित्तर करते भये . 

२५ की शाम उनसे बात हुई . पता चला कि २६ की शाम या २७ की सुबह बैठक जमेगी .  घर की मालकिन को ,जिन्हें मैं आगे प्रमिला के नाम से संबोधित करूंगा, बताया कि कानपुर से एक मित्र आ रहे हैं . बोलीं ठीक है . न उन्होंने पूछा कि कौन से मित्र, न हमने बताया कि ये वाले मित्र. ठीक ही रहा . ऊपर जो परिचय आपको बताया , वह अगर उनको बताया होता तो बिना बात ‘नरभसा’ जातीं . मित्रगण चूंकि आते रहते हैं, वे अभ्यस्त हैं .इतना ज़रूर बोलीं कि  भलामानस जब आने की खबर करे  तो उन्हें भी ज़रूर सूचित किया जाए . सामान्यतः होता यह है कि  मित्रों की   ‘आ गये हैं ’  की  हुंकार के बाद ही उन्हें पता लगता है कि वे आने भी वाले थे .  २६ को शाम छह-सात बजे तक जब अनूप जी की ओर से कोई खबर नहीं मिली तो मैंने मान लिया कि अब वे अगले दिन सुबह ही आएंगे . और वही प्रमिला को भी सूचित कर दिया था . पर अनूप जी ने भी मित्रों की चिरपोषित परम्परा को समुचित सम्मान देते हुए लगभग सवा सात-साढे सात बजे घर में अपनी सशरीर उपस्थिति का उदघोष किया . घर के बिल्कुल निकट ही था कि बिटिया गौरी ने यह सुसमाचार दिया . हमने भी अशक्त शरीर से लम्बे-लम्बे डग भरे और यथासम्भव दुलकी चाल से घर की ओर चल पड़े.

इधर लिफ़्ट का बटन दबाया उधर कुछ ही क्षणों में हम घर पर थे और अपने को साक्षात फ़ुरसतिया से गले मिलता पाया . तस्वीरें कई देख चुका था . फ़िर से देखा . एकदम वही — हूबहू — ऑरिजिनल कॉपी में –  सजीव . मन प्रसन्न और भावुक एकसाथ भया . प्रसन्न हुआ लगभग वर्ष भर के आभासी संवाद के पश्चात एक साथी की जीवंत उपस्थिति से . भावुक भया यह सोचकर कि इस प्रौद्योगिकी को मैं कितनी लानत-मलामत भेजता हूं,जबकि इसी की वजह से मिले एक मित्र के आत्मीय बाहु-पाश में जकड़ा खड़ा हूं .जकड़ा इसलिए था क्योंकि उधर अनूप की लहीम-शहीम काया थी और इधर अपना साठ किलो वजन और वाइरल फ़ीवर की बची-खुची टूटन संभालता मैं .

मित्र मेरे जीवन की संजीवनी हैं . किंचित गर्व के साथ इस बात की सार्वजनिक घोषणा करने का भी मन है कि इस दृष्टि से बहुत भाग्यशाली रहा हूं . बहुत-सी जगहों पर रहने का मौका मिला . और जिस जगह भी रहा, मित्रों से भरा-पूरा एक संसार हमेशा साथ रहा है, मेरी आतिशमिजाज़ी  और तरेर, जिसे राजस्थानी में ‘रड़क’ कहते हैं, के बावज़ूद . और वे पुरानी  ज़गहें छूटकर भी नहीं छूटीं तो सिर्फ़ इसलिए कि मित्र अब भी  वहां हैं . और आज तो आभासी ताने-बाने से जुड़े एक मित्र से साक्षात्कार का मांगलिक दिन  था .

इधर बात-चीत का दौर शुरु हुआ और उधर मुझे लगने लगा कि बल लौट रहा है . अपनी ही आवाज़ का भराव मुझे चौंका रहा था . बतरस के औषधीय गुणधर्म पर मेरी आस्था और पक्की होती जा रही थी .

बात-चीत में अनामदास,प्रमोद सिंह,ज्ञानदत्त पांडेय और रवीश की तारीफ़ों के पुल बांधे गए . अनामदास और रवीश के स्वच्छ भाषाई प्रवाह और संतुलित लेखन की शान में कसीदे काढे गए .  प्रमोद भाई की भाषिक  लोच, लोकभाषाओं-बोलियों की छौंक और अभिव्यक्ति की इच्छित परिपूर्णता की सिद्धि के लिए हिंदी के सामान्य व्याकरण को दाएं-बाएं चपतियाते उनके सुललित गद्य पर ‘मर मर जावां’ वाली स्थिति आई और थोड़ा ‘जय हो जय हो’ टाइप कुछ हुआ . तब तक ज्ञान जी बात-चीत के केन्द्र में दाखिल हो गये . मैंने उनके ‘ओपन एण्डेड’ प्रसन्न गद्य की तारीफ़ की और नए-नए शब्द ‘कॉइन’ करने की उनकी क्षमता पर बलिहारी हुआ . इधर अनूप जी ने यह सोचकर  कि तारीफ़ का दैनिक कोटा कहीं ज्ञान जी तक आकर ही ‘शेष’ न हो जाए, तुरंत थोड़ा श्रेय लिया,यह कह कर कि ज्ञान जी तो बेसिकली अंग्रेज़ी के ब्लॉगर हैं और हिंदी में लिखना तो उन्होंने  फ़ुरसतिया की सलाह पर ही शुरु किया है और अभी वे हिंदी में अपनी अभिव्यक्ति तलाश रहे हैं .

हमने तुरतै ‘ऑब्जेक्शन’ किया यह कह कर कि इतने अभिव्यंजक शब्दों की गढंत करने वाला यह व्यक्ति न केवल अपनी भाषा तलाश चुका है,वरन उससे  खेल-खिलवाड़ भी कर रहा है . प्रमोद भाई के अनुपम दूध-जलेबी गद्य को ‘छल्लेदारतम’ घोषित करते हुए और उनके लेखन पर जब-तब तुरुप लगाते हुए हिंदीवालों के लिए ‘आकांक्षाओं के आदिवासी’ जैसा पद-बंध इस्तेमाल करने वाला कोई सिद्ध पुरुष ही हो सकता है, नौसिखिया उर्फ़ ‘सीखतोड़ा’ नहीं . सो हम अपने स्टैण्ड पर डटे रहे . ऐसा लगा अनूप जी ने  भी कुछ कहा .  ’हां’ जैसा ‘न’ कहा या ‘न’ जैसा ‘हां’  कहा यह स्पष्ट नहीं हुआ .

इधर इतनी चालाकी हमने भी बरती कि फ़ुरसतिया को यह नहीं बताया कि हमें उस मराठी ग्रामीण भगवान जाधव कोली में ईश्वर के दर्शन करने वाले, भृत्य भरतलाल और राजमिस्त्री हरिश्चंद्र को अपने चिंतन एवम चिंता का केन्द्र बनाने वाले ,भिंडी-नेनुआ-सूरजमुखी को देखकर मगन-मुदित होने वाले और सीताराम सूबेदार-अमृतलाल वेगड़ की लिखंत पर बलि-बलि जानेवाले सूक्ष्म-संवेदनतंत्र के स्वामी ज्ञान जी पसंद हैं, पर इस लोककल्याणकारी राज्य के संसाधनों पर पढा-लिखा वह उच्च-भ्रू  किसानोदासीन (अगर किसान-विरोधी नहीं तो) कॉरपोरेट-प्रेमी ; ‘मीक’ और  लल्लू-पंजू आदमी को नापसंद करने वाला (भले बाइबल कहती रहे ‘द मीक शैल इनहेरिट द अर्थ’) और हर गरीब कर्ज़दार ‘डिफ़ॉल्टर’ को आधारभूत ढंग से बेईमान  समझने वाला (इस पर कोई टिप्पणी किए बिना कि बड़े-बड़े सेठ-साहूकार राष्ट्रीयकृत बैंकों का कितना पैसा दबाए बैठे हैं)   विशुद्ध अफ़सर  मुझे  बेचैन करता है  .

इधर अनूप जी ने हमारे लिखने-पढने को लेकर थोड़ी-सी जिज्ञासा क्या प्रकट की हम पैर टिकाने की जगह पाकर परम-प्रफ़ुल्लित भए  और  फ़ोकस मारने के लिए (कि हमहूं कछु हैं और जोइ-सोइ कछु गाते हैं) अपने सम्पादकत्व , सह-सम्पादकत्व और सम्पादन-मण्डलत्व में छपे जितने भर विशेषांक हड़बड़ी में आस-पास दिखे,  उनके पास लाकर ठेल दिए . उन्होंने गुरु-गंभीर भाव से मुआइना किया (इतने कम समय में पढते तो खाक) और तारीफ़नुमा कुछ कहा . पत्रिका के ‘आज का मीडिया’ अंक को देखकर कहा, “अरे! आप लोगों ने तो यह ‘हंस’ के विशेषांक से भी पहले, सन २००० में ही निकाल दिया था .” हमने यह सोचकर संतोष की सांस ली कि बाल-बाल बचे जो हमारा अंक पहले निकला,वरना आज़ बात कच्ची हो जाती और फ़ुरसतिया हमें पिछलग्गू घोषित किए बगैर नहीं रहते .

‘धर्म,आतंकवाद और आज़ादी’ पर केन्द्रित अंक में असगर अली इंज़ीनियर के लेख पर नज़र मार कर फ़ुरसतिया जी ने कहा कि ‘अच्छे विचारक हैं,अभी इनकी एक पुस्तक लाया हूं जो पढनी बाकी है’. उन्होंने हमारी एक कविता ‘सबसे बुरा दिन’ की भूरि-भूरि प्रशंसा की . हम बहुत खुशियाए-लजाए और लजाए-खुशियाए . और मारे शर्म के यह भी नहीं बता सके कि इस कविता को पढकर मुझे वरिष्ठ हिंदी कवि लीलाधर जगूड़ी और बीबीसी फ़ेम वरिष्ठ पत्रकार-प्रसारक-उद्घोषक राजनारायण बिसारिया ने चलाकर फोन किया बधाई देने के लिए .  समय कम था इसलिए और-और ज़रूरी बातें कर लेने का प्रेशर भी था . मृत्युंजय द्वारा संपादित ‘हिंदी सिनेमा का सच’ और लक्ष्मण केडिया द्वारा सम्पादित ‘भवानीप्रसाद मिश्र के आयाम’ के अलावा उन्हें ‘२०४७ का भारत’ और ‘कविता इस समय’ अंक भी दिखाया . उन्होंने थोड़ी-बहुत नज़र मारकर बतरस का सिलसिला फिर शुरु कर दिया .

अब तक अनूप जी  गौरी बिटिया द्वारा बनाई गई चाय (वह भी ठंडी) के नशे में तरंगित हो चुके थे . जीतू के हड़बड़ियापन और नाम-लिप्सा पर बारीक चुटकी ली और उनकी २४ कैरेट की भलमनसाहत को सराहा . लगे हाथों बीएचयू में अपने नेतागीरी के जमाने में  अफ़लातून जी की लड़कियों के मध्य लोकप्रियता पर समुचित प्रकाश डाला . हमें इसमें रहस्योद्घाटन जैसा कुछ  नहीं लगा . लड़कियों में लोकप्रिय हुए बिना कोई समाजवादी कैसे हो सकता है . यह तो उसकी बेसिक क्वालीफ़िकेशन है . जब अफ़लातून अब तक प्रमोद भाई की नज़र में चढ़ जाने लायक धांसू रंगीन कुर्ते पहनते हैं तो जवानी में क्या कहर ढाए होंगे, इसका अंदाज़ लगाया सकता है. उड़नतश्तरी की लोकप्रियता के कारण खोजे गए . मेरा भाई गज़ब का आसान लिखकर शिकार फ़ांसता है . ऊपर से सबके यहां टिप्पणी इतनी मीठी करता है कि किसी के ब्लॉग पर लगातार पांच-सात दिन टिप्पणियां कर दे तो उस पट्ठे को शर्तिया डाइबिटीज़ हो जाए . 

इस बीच मैंने नारद पर राहुल के ब्लॉग को बैन करने का मुद्दा छेड दिया और अनूप भाई से इसे तुरत निपटाने का अनुरोध किया . यह भी कहा कि इस बैन से मेरा सैद्धांतिक विरोध है तथा नारद के चरित्र और भविष्य को ध्यान में रखते हुए इस बैन को हटा लेना चाहिए . अनूप जी ने कहा कि यह मामला बहुत साधारण था किंतु दो    समूहों के बीच मूंछ की लड़ाई ने इसे जटिल बना दिया है . तथापि उन्होंने इसके शीघ्र हल होने की सम्भावना व्यक्त की .

इस बीच प्रमिला जी आ गईं . उनसे शुरुआती दुआ-सलाम के बाद फ़ुरसतिया जी सीधे करुण रस से भरे (करुण रस भुक्तभोगी के लिए,हास्य रस पाठक के लिए ) उस  ‘बकरीपुराण’  में उल्लिखित-वर्णित  घटना की तफ़तीश करने लगे . मामला नवोढ़ा द्वारा लिखे पहले प्रेमपत्र का था अतः अठारह साल पुरानी घटना-दुर्घटना को समुचित गरिमा प्रदान करते हुए प्रमिला ने पारंपरिक लज्जा-प्रदर्शन में गैर-पारम्परिक वाक्संयम का अनूठा और कौशलपूर्ण संयोग रचते हुए अपनी मुस्कराहट से सवालों को ‘डिफ़्लैक्ट’ कर दिया .  

 उधर बिटिया गौरी देवी ने ( यह देवी जान-बूझकर लिखा है,ताकि गौरी को मुझसे लड़ने-रिसियाने का एक और बहाना मिल सके. मुझे अब तक यह समझ में नहीं आया है कि ‘देवी’ मध्यनाम में बुरा क्या है ? ) यह कहकर मां-बाप पर निशाना साधा कि जब वह कोई अच्छा और तारीफ़ लायक काम करती है तो  मां और पिताश्री दोनों ही आत्ममुग्ध होकर अलग-अलग यह घोषणा करते हैं कि यह मुझ पर गई है . और खुदा-न-खास्ता कोई टूट-फूट या गलती हो जाए तो दोनों यह आरोप एक-दूसरे पर लगाते दिखाई देते हैं .  शुभंकर जी उर्फ़ छटंकी लाल साइकल चलाकर और देर तक शावर के नीचे नहाकर लौटे थे. कुछ अन्यमनस्क से प्रतीत हुए, फलस्वरूप उन्होंने बात-चीत में कोई विशेष रस नहीं लिया . वरना माता-पिता की एक-आध पोल-पट्टी और खुलती .

फ़ुरसतिया जी ने अपने मित्र इंद्र अवस्थी और उनके माध्यम से उनके मामा डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी और कुमारसभा पुस्तकालय का ज़िक्र किया. हमने कहा भाई वे तो हमारे भी मित्र हैं . वैचारिक भिन्नता के बावजूद इस सुवक्ता से हमारी मित्रता है . वे उत्तर कोलकाता में रहते हैं और मैं दक्षिण कोलकाता में . किंतु बकलम प्रमोद सिंह हिंदी का पोखर बहुत छोटा है . इसलिए किसी लोकार्पण समारोह में,किसी कविगोष्ठी में,किसी प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल के सदस्य के रूप में ,किसी टीवी कार्यक्रम के प्रतिभागी के रूप में मिलना हो ही जाता है . हमारे संस्थान में स्वर्णजयंती व्याख्यान देने के मेरे प्रस्ताव पर आचार्य विष्णुकांत शास्त्री को राजी करने में उनकी भी  भूमिका थी . ‘काव्य का वाचिक सम्प्रेषण’ यानी कविता का पाठ कैसे किया जाय,इस विषय पर वह अद्भुत व्याख्यान था जिसे मेरे सहकर्मी आज भी याद करते हैं . 

अनूप भाई का मन शिवकुमार मिश्र और मान्या से मिलने का था . पर मैं तब तक (और अब तक भी) उनसे सम्पर्क नहीं साध सका था . इसलिए मिलना संभव न हो पाया . बस यही वह जगह है जहां मैं तमाम मिलनसारिता के बावज़ूद अनूप जी से कच्चा पड़ जाता हूं .यदि अनूप कोलकाता में रहते और मैं कानपुर से मिलने आता तो यह हो नहीं सकता था कि मुझे मान्या और शिवकुमार मिश्र से बिना मिले लौटना पड़ता . अब मैं किससे शिकायत करूं कि भाई शिवकुमार मिश्र का पता ज्ञान जी से दरियाफ़्त किया था पर वे सुट्ट खींच गए . सोचा होगा वित्तीय सलाहकार हैं ,फ़ोकटिया राय मांगनेवाले कहीं उन्हें बेमतलब तंग न करने लगें .

चिट्ठाकार बिरादरी को लेकर कुछ भावी योजनाएं बनाईं गईं . कुछ तूमाल बांधे गए . जिन पर तब तक कुछ कहना नासमझी होगी जब तक कोई  ठीक-ठीक ‘कंक्रीट’ रूपरेखा उभर कर सामने न  आए .

खाना खाते हुए भी बात-चीत बदस्तूर जारी थी . हम एक-एक मिनट का सदुपयोग चाहते थे . इसी बीच एक बार लाइट ने लुका-छिपी  खेली. रात घहराने लगी थी . अनूप जी को कोलकाता के उस उत्तरी किनारे दमदम जाना था . न चाहते हुए भी उठना पड़ा . हमने उनसे कहा कि आप दिन में आये होते तो आपको झील के किनारे घुमाने ले चलते . कई मील में फ़ैली बहुत बड़ी झील है हमारे घर के पास .  इसे ढाकुरिया लेक या रवीन्द्र सरोवर के नाम से जानते हैं .

नीचे उतर कर बात-चीत का एक और दौर चला . चलते-चलाते मैंने पुनः अनूप जी से ‘बैन’ प्रकरण के ‘ऐमिकेबल’ हल का अनुरोध किया . अनूप जी ने पुनः आश्वासन दिया और कहा कि यह तो कोई मुद्दा ही नहीं है .

तीन-चार घंटे की बतरस के बावजूद मन नहीं भरा था . कितने ही ब्लॉगर-मित्र थे जिनके बारे में बात करने की हुड़क मन में थी . पर ड्राइवर थकी और याचना भरी नज़रों से हमें निहार रहा था . हमने फिर से एक-दूसरे के हाथ थामे . मुझसे कविताओं पर लिखने की गुजारिश करते हुए  अनूप रथारूढ हुए .

 इस तरह श्रीश्री १०८ अनूपाचार्य लौटते भए .

 इधर लौट कर आया तो प्रमिला ने हड़काते हुए खबर ली कि पहले क्यों नहीं बताया . तुम्हारी लापरवाही से ऐन निर्जला एकादशी के दिन हाथ आया ‘बाभन’  बिना खीर खाए  चंगुल से बच निकला .

**********

 

नोट : इस पोस्ट में स्माइली इतनी जगह लगना था कि समूची पोस्ट में स्माइली ही स्माइली दिखाई देते . दूसरी बात यह कि अभी मैंने स्माइली लगाना सीखा नहीं है . अतः मित्रों से अनुरोध है कि वे स्वयं यथास्थान स्माइली लगा कर पढने की कृपा करें .

July 6, 2007

पूछती है मेरी बेटी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:20 pm

दिनेश कुशवाह की एक कविता

 

पूछती है मेरी बेटी

 

जनक बहुत कुछ जानते थे सीते !

जैसे कि हल की मुठिया थामे बिना राजा

नहीं समझ सकता दुख प्रजा का

 

कि क्या होती है पोषिता कन्या

पोषिता कुमारी ?

कितना कठिन है उसका जीवन-निर्वाह

 

इसलिए पिता विदेह ने

तुम्हें स्वयंवरा बनाया

कि स्वयं वर

बल-बुद्धि-संयम शील युक्त वर

पर रख दी शंभु-धनु-भंजन की शर्त

 

अपनी अमूल्य धरोहर दांव पर लगाकर भी

पिता निश्चिंत होना चाहता है

कहती है मेरी पत्नी

एक लड़की का पिता होकर ही

जाना जा सकता है

बहुत कुछ कर सकने की सामर्थ्य

और कुछ न कर पाने की मजबूरी को

 

पूछती है मेरी बेटी

पापा! समय ने तुममें और जनक में

कोई फ़र्क किया है क्या ?

और सोचता हूं मैं

एक वन से दूसरे वन जाना

वन-वन रोना ही नियति है क्यों

आज भी हमारी बेटियों की ।

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

July 4, 2007

अटपटा छंद

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:39 am

प्रियंकर की एक अपेक्षाकृत ताज़ा कविता

 

अटपटा  छंद

 

भारतवर्ष   उदय

भारतीयता अस्त

रोयां-रोयां कर्जजाल में

नेता-नागर    मस्त

 

ब्रह्मज्ञानी बिरहमन

इश्क-दीवाना दरवेश

बाज़ार   का   बाना

साधू    का    वेश

 

जनेऊ से कमर का खुजाना

मोरछल से लोबान का उड़ाना

मोबाइल पर नए क्लाइंट से बतियाना

 

जगत सत्यं     ब्रह्म मिथ्या

घृतम पिवेत ऋणम कृत्वा

उधार    प्रेम का   फ़ेवीकोल

बीच  बाज़ारे     हल्ला बोल

 

द ग्रेट इंडियन शादी-बाज़ार

कन्या   में   डर

माथे पर प्राइस टैग

सजे-धजे   वर

 

बनी की अंखियां सुरमेदानी

बनी का बाप   कुबेर

थाम हाथ में स्वर्ण-पादुका

दूल्हे को    ले घेर

 

नदिया   गहरी

नाव    पुरानी

बरसे    पैसा

नाच मोरी रानी

 

बीच भंवर में बाड़ी

बाड़ी में    बाज़ार

चौराहे पर चारपाई

आंगन में व्यापार

अपलम-चपलम गाड़ी

बैकसीट पर    प्यार

 

माया ठगिनी रूप हज़ार

लंपट    तेरी जयजयकार

आजा    मेरे    सप्पमपाट

मैं तनै चाटूं तू मनै चाट

 

देवल चिने अजुध्या नगरी

मन का    मंदिर    सूना

घट-घट वासी राम के

अंतर   को   दुख   दूना ।

 

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