अनहद नाद

August 31, 2007

विकास नारायण राय की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:26 am

विकास नारायण राय

ग्यारह सितम्बर

 

॥१॥

अमेरिकी मान बैठे थे –

इतिहास का अंत हो चुका

संस्कृति टीवी के पर्दे में सिमट गई

और प्रतिद्वंद्वी दूसरे ग्रहों से आएंगे

ग्यारह सितम्बर ने बताया –

जिस दुनिया को चाटते रहे हैं

जाहिली,गरीबी और शोषण के दीमक

उसी दुनिया में उन्हें भी रहना है ।

॥२॥

अगर अल्लाह ने

तालिबान की फतह चाही होती

तो क्रूज़ मिसाइलें अमेरिका को देता ?

अगर मुनाफ़ा ही

दुनिया का नियामक रहा होता

तो वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर

रसातल में धंसा होता ?

॥३॥

अफीम अफ़गानिस्तान में उगती है

अमेरिका में खपती है

हथियार अमेरिका में बनते हैं

अफ़गानिस्तान में खपते हैं

ग्यारह सितम्बर

न्यूयॉर्क पहुंचने से पहले

काबुल से गुज़रा था

न्यूयॉर्क में खून

शेयर गिरने से पहले

काबुल से महंगा था ।

॥४॥

बुश जहाज से बम गिराता है

ओसामा बम से जहाज

बुश आज से कल मारता है

ओसामा कल से आज

जैसे आक्रमण और आतंक

परस्पर रक्तबीज हैं

वैसे ट्रेड सेन्टर और तालिबान

भी एक ही चीज़ हैं

जिस तरह वैभव का पहाड़

वंचना की खाई का जनक है

उसी तरह अमेरिकी पूंजी

ही तालिबान की पूरक है ।

॥५॥

ओसामा मर्द बंदा है

पाक रखता है औरत को

घर और बुर्के की बंदिशों से

कुर्बानी उसका धंधा है

भर्ती करता है जेहादी को

सस्ती से सस्ती मंडियों से

बुश समर्थ योद्धा है

बांधे रखता है सारी समृद्धि

अपनी सरहदों में रोक कर

न्याय क्योंकि अंधा है

लेज़र से ढूंढता है शांति

अचूक मिसाइलों की नोक पर ।

॥६॥

क्या तालिबानों को

अमेरिका बन कर ही पीटा जा सकता है

मदरसों और गुफाओं को

मिसाइलों से ही जीता जा सकता है ?

क्या ज्ञान की दुनिया में

अमेरिकी समृद्धि से

पायदान बन कर ही जुड़ा जाएगा

इंसान की दुनिया में

शैतानी बुद्धि से

तालिबान बन कर ही भिड़ा जाएगा ?

॥७॥

तालिबान संसार का रुआंसा बेटा है

अमेरिका मुनाफ़े की खुराक से मोटा है

तालिबान अमेरिका का पूर्वज है

अमेरिका तालिबान का पिता है

दुनिया उनके लिए पुश्तैनी जागीर है

उनमें बांट-बखरे का झगड़ा है ।

 

**********

 

(समकालीन सृजन के   धर्म,आतंकवाद और आज़ादी  अंक से साभार)

  फोटो साभार : एच.पी.ए. साइट

August 30, 2007

समयगंधा

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:20 am

 Bhavani bhai

भवानी भाई की एक कविता

 

समयगंधा

 

तुमसे मिलकर

ऐसा लगा जैसे

कोई पुरानी और प्रिय किताब

एकाएक फिर हाथ लग गई हो

 

या फिर पहुंच गया हूं मैं

किसी पुराने ग्रंथागार में

 

समय की खुशबू

प्राणों में भर गई

 

उतर आया भीतर

अतीत का चेहरा

 

बदल गया वर्तमान

शायद भविष्य भी ।

 

********

 

August 29, 2007

तो

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:31 am

Leeladhar Jagoori

लीलाधर जगूड़ी की एक कविता

 

तो

 

जब उसने कहा

कि अब सोना नहीं मिलेगा

तो मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ा

पर अगर वह कहता

कि अब नमक नहीं मिलेगा

तो शायद मैं रो पड़ता ।

 

*********

 

( काव्य संकलन ‘घबराये हुए शब्द’ से साभार )

 

August 28, 2007

सेब बेचना

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:55 am

 

रघुवीर सहाय की एक कविता

 

सेब बेचना

 

मैंने कहा डपटकर

ये सेब दागी हैं

नहीं नहीं साहब जी

उसने कहा होता

आप निश्चिंत रहें

तभी उसे खांसी का दौरा पड़ गया

उसका सीना थामे खांसी यही कहने लगी ।

 

**********

 

( कवि की फोटो अनुभूति-हिंदी.ऑर्ग   से साभार )

 

August 27, 2007

लीलाधर जगूड़ी की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:36 am

 

Leeladhar Jagoori

प्रार्थना

 

फलो !

जब महंगे बेचे जाओ

तो तुरंत सड़ जाया करो

छूते ही या देखते ही ।

 

********

 

( काव्य संकलन ‘घबराये हुए शब्द’ से साभार )

 

August 24, 2007

रघुवीर सहाय की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:42 pm

रघुवीर सहाय (1929-1990) 

 

अरे अब ऐसी कविता लिखो

 

अरे अब ऐसी कविता लिखो

कि जिसमें छंद घूमकर आय

घुमड़ता जाय देह में दर्द

कहीं पर एक बार ठहराय

 

कि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूं

वही दो बार शब्द बन जाय

बताऊं बार-बार वह अर्थ

न भाषा अपने को दोहराय

 

अरे अब ऐसी कविता लिखो

कि कोई मूड़ नहीं  मटकाय

न कोई पुलक-पुलक रह जाय

न कोई बेमतलब अकुलाय

 

छंद से जोड़ो अपना आप

कि कवि की व्यथा हृदय सह जाय

थामकर हंसना-रोना आज

उदासी होनी की कह जाय ।

 

***********

 

( कवि की फोटो अनुभूति-हिंदी.ऑर्ग   से साभार )

 

न सही कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:51 am


ध्रुवदेव मिश्र ‘पाषाण’

 

न सही कविता

 

अगर यह फतवा सही है

कि

धरती पर

न कहीं पानी है

न कहीं प्यार

तो

कैसे लहरा रहे हैं

सात-सात सागर

 

कैसे बचाये रखते हैं

भूख-प्यास के बावजूद

आंखों की चमक

माताओं के इर्द-गिर्द बच्चे ?

 

न किसी की दया है

न कोई चमत्कार

कि

आकाश की छाया में

सुरक्षित है

जीवन की धरोहर

 

रीत नहीं गया

आज भी प्यार का कोष

खुशी-खुशी बांट देते हैं लोग

हिस्से की रोटी

और बदन का खून

ज़रूरतमंद होठों पर

दूधिया मुस्कान के लिये

 

बड़ी विराट है

आकाश की छाया

बेफ़िक्र

उगते रहते हैं तारे

खिलते रहते हैं फूल

गाछ-गाछ

फूटते रहते हैं कंछे

 

हां

थोड़ा अधिक गड़बड़ा गये हैं

कुछ अधिक चालाक

कुछ अधिक बालिग लोग

उनकी दानिशमंद आंखों को

रास नहीं आती

पानी और प्यार की गोद में किलकती दुनिया

 

आदमी से छीन लेने के लिये

तारों की छांव

और फूलों का पड़ोस

मुल्तवी कर रहे हैं वे

तमाम अच्छे काम

मसलन

बच्चों के साथ मुस्कुराना

कंछों के साथ हरियाना

 

गझिन बादलों में उगे इन्द्रधनुष को

सराहती आंखों में

तेजाब उंड़ेलते दानिशमंदों के खिलाफ़

मेरे प्राणों में उठती पुकार न सही कविता

धरती के कण्ठ की गुहार ही सही

इसे सुन तो लो

रावण के इलाके में

सीता का ठिकाना ढूंढते लोगो !

 

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( काव्य संकलन ‘खंडहर होते शहर के अंधेरे में’ से साभार )

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

August 22, 2007

ध्रुवदेव मिश्र ‘पाषाण’ की दो कविताएं

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 12:20 pm


ध्रुवदेव मिश्र ‘पाषाण’

 

॥१॥ 

विडंबना 

 

अपने बैकुंठ की रक्षा में

हमारे इर्द-गिर्द

रोज़-रोज़

रचते हुए भी एक नया नर्क

तुम हमारे हो प्रभु !

 

॥२॥

उगो

 

तुम्हारे इन्तज़ार में

अंधी हो रही हैं दिशाएं

काले भंवर में

चक्कर काट रही है पृथ्वी

 

उगो

कि झूमते दिखें

खेत-खेत नये अंकुर

 

उगो कि ताल-ताल खिलें

सहस्र-दल नेह-कमल

 

उगो कि तुम

दिशाओं की आंख हो सूरज !

 

उगो

कि तुम

पृथ्वी का प्यार हो सूरज !

 

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कवि परिचय : ग्राम इमिलिया(भटनी),जिला देवरिया(उ.प्र.) में सन १९३९ में जन्म, बुद्ध डिग्री कॉलेज,कुशीनगर से स्नातक, अंबिका हिंदी हाई स्कूल,शिवपुर(हावड़ा) में १९६५ से २००२ तक अध्यापन . मानिक बच्छावत और छविनाथ मिश्र के साथ कोलकाता महानगर के वरिष्ठतम कवियों में से एक . बेहद प्यारे इंसान . १९५७ में पहली पुस्तक ‘विद्रोह’ शीर्षक से एक नाटक . १९६२ से २००० के बीच ग्यारह काव्य संकलन . प्रस्तुत कविता उनके काव्य संकलन ‘खंडहर होते शहर के अंधेरे में’ से ली गई है . ‘विसंगतियों के बीच’, ‘धूप के पंख’, ‘वाल्मीकि की चिन्ता’, ‘चौराहे पर कृष्ण’ तथा ‘ध्रुवदेव मिश्र पाषाण की कविताएं’ उनके अन्य काव्य संग्रह हैं .

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कवि का फोटो इरफ़ान के ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई से साभार

 

August 17, 2007

‘अनहद नाद’ का पहला साल

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 9:49 am

कोलकाता

17-08-2007 

साथियो, 

‘अनहद नाद’  ने कल यानी 16 अगस्त 2007 को अपना पहला साल पूरा कर लिया . कुछ गद्य भी लिखा गया पर मूलतः यह चिट्ठा कविताओं पर ही केन्द्रित रहा . यद्यपि इसमें सभी भाषाओं की कविताएं देने का लक्ष्य रखा गया था पर बांग्ला  से अनूदित कुछ कविताओं को छोड़ दें तो यह चिट्ठा ‘अनहद नाद’  प्रमुखतः हिंदी कविताओं को ही समर्पित रहा . यह इसकी विशेषता भी रही और सीमा भी . विशिष्टता बुरी चीज़ नहीं है पर बड़ा लक्ष्य हासिल करने के लिए सीमाओं के पार नए क्षितिज खोजने होते हैं .

इस एक वर्ष में ‘अनहद नाद’  पर कुल 108 पोस्ट प्रेषित की गईं और यह चिट्ठा आपको विभिन्न कवियों की  सौ से अधिक कविताएं पढवाने में सफल रहा . जिनमें 15 कविताएं इस चिट्ठाकार की भी थीं .   बारह महीने में कुल  14430 लोग इस चिट्ठे पर आये . यह बहुत बड़ी संख्या तो नहीं है पर हिंदी चिट्ठों के ट्रैफ़िक और तिस पर कविता, विशेषकर हिन्दी कविता में पाठकों की घटती रुचि को देखते हुए इसे बहुत निराशाजनक  आंकड़ा भी नहीं कहा जा सकता . कुल  584  पाठकों ने टिप्पणी देकर चिट्ठाकार का उत्साह बढाया . जिनके प्रति आभार प्रकट करना  चिट्ठाकार की  व्यक्तिगत जिम्मेदारी है .  एक दिन में चिट्ठे पर आने वालों की सर्वाधिक संख्या 299   रही . ऐसा तो कई बार हुआ कि एक दिन में 250 या उससे अधिक व्यक्ति चिट्ठे पर आए .

भगवत रावत, नरेश सक्सेना, कुंवर नारायण, राजकिशोर, लीलाधर जगूड़ी, मानिक बच्छावत, केदारनाथ सिंह, सुनील गंगोपाध्याय, महेन्द्र सिंह पूनिया, संजय कुंदन, गिरिधर राठी, जितेन्द्र श्रीवास्तव, नीलेश रघुवंशी, विजेन्द्र, जगन्नाथ आज़ाद, मनमोहन, प्रयाग शुक्ल, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, सुंदरचंद ठाकुर, अरुण कमल, कैलाश सेंगर, वीरेन्द्रप्रसाद सिंह, विष्णु नागर, रविदत्त पालीवाल, विजय गौड़, विष्णुचंद्र शर्मा, रंजीत कुमार रॉय, अनूप मुखर्जी, निशांत, शुभा, अल्पना मिश्रा, राजीव शुक्ल, मनीषा झा, कीर्ति चौधरी, गीत चतुर्वेदी, उदय प्रकाश, भवानीप्रसाद मिश्र, ऋतुराज, राजेन्द्र उपाध्याय, पवन मुखोपाध्याय, राग तेलंग, श्यामल शील, दिनेश कुशवाह, अष्टभुजा शुक्ल, खलील जिब्रान, बोधिसत्व, ज्योतिर्मय दास, विनोद कुमार शुक्ल, विनय दुबे, अमिताभ गुप्त, योगेश अटल, देवीप्रसाद मिश्र, रति सक्सेना, अशोक वाजपेयी, इंदु जैन, बसंत त्रिपाठी, शहंशाह आलम, हरीश चंद्र पांडेय और प्रियंकर प्रमुख कवि हैं जिनकी कविताएं ‘अनहद नाद’ पर प्रेषित की गईं .

 प्रस्तुत कविताओं में से अधिकांश कविताएं कोलकाता से प्रकाशित लघु पत्रिका समकालीन सृजन द्वारा प्रकाशित समकालीन हिंदी कविता पर केन्द्रित महत्वपूर्ण अंक ‘कविता इस समय’ से साभार ली गई हैं . संपादक मंडल का सदस्य होने के नाते मुझे इस अंक के सम्पादन से जुड़े रहने का अवसर मिला था .

प्रत्येक माह के हिसाब से वर्गीकरण इस प्रकार रहा :

अगस्त२००६ : आत्मा का राग(प्रियंकर), भगवत रावत की एक कविता(वे इसी पृथ्वी पर हैं), नरेश सक्सेना की कविता(घास), कुंवर नारायण(दीवारें), राज किशोर की एक कविता(अच्छा)

सितम्बर२००६ : प्रियंकर की एक कविता(प्रतीत्य समुत्पाद), लीलाधर जगूड़ी की एक कविता(मेरा ईश्वर), मानिक बच्छावत की कविताएं(पहचान व पृथ्वी), पुरस्कृत होंगे कवि मानिक बच्छावत

अक्टूबर२००६ :केदारनाथ सिंह की एक कविता(हिंदी के बारे में एक हिंदी कवि का बयान), प्रियंकर की एक कविता(सबसे बुरा दिन), प्रियंकर की एक प्रेम कविता(तुम मेरे मन का कुतुबनुमा हो), तमसो मा ज्योतिर्गमय

नवम्बर२००६ :किताबनामा/प्रियंकर(विजेन्द्र के काव्य-चित्र संकलन की समीक्षा-भाग १-२, साभार: वागर्थ), सुनील गंगोपाध्याय की एक कविता(सिर्फ़ कविता के लिए),महेन्द्र सिंह पूनिया की एक कविता(कमी)

दिसम्बर२००६ :संजय कुंदन की एक कविता(यमुना तट पर छठ), प्रियंकर की एक कविता(इक्कीसवीं सदी की रथयात्रा), राजकिशोर की एक गज़ल, प्रियंकर की एक कविता, साभार: जनसत्ता वार्षिकी(कहता है गुरु ग्यानी), प्रियंकर की एक कविता(जिसे तुम सपना कहती हो और मैं भविष्य)

जनवरी२००७ :कुंवर नारायण की एक कविता(जिस समय में),गिरधर राठी की एक कविता(दिल्लीनामा),जितेन्द्र श्रीवास्तव की एक कविता(लुंगी)

फरवरी२००७ :नीलेश रघुवंशी की एक कविता(जंगल और जड़), प्रियंकर की एक कविता(नंदिनी के लिए),विजेन्द्र की एक कविता(अच्छत धरती),बेजी आपके सवालों के जवाब हाज़िर हैं(प्रियंकर)

मार्च२००७ :जगन्नाथ आज़ाद की नज़्म : भारत के मुसलमां(१९४९), भगवत रावत की एक कविता(मेधा पाटकर),कुछ और : मनमोहन की एक कविता,इस पृष्ठ पर : प्रयाग शुक्ल की एक कविता,निराशा एक बेलगाम घोड़ी है:राजेश जोशी की एक कविता,त्वचा ही इन दिनों दिखती है चारों ओर:मंगलेश डबराल की एक कविता

अप्रैल२००७ :मौन रहे(प्रियंकर की एक कविता),मत हंसो पांचाली(प्रियंकर की एक कविता),इच्छा तो बहुत थी(अरुण कमल की एक कविता),औरत(कैलाश सेंगर की तीन कविताएं),अभिधान(वीरेन्द्रप्रसाद सिंह की एक कविता),मां सब कुछ कर सकती है(विष्णु नागर की एक कविता),जब तक पेड़ है(रविदत्त पालीवाल की एक कविता),सोचो थोड़ी देर(विजय गौड़ की एक कविता), सभ्यता का जहर(विष्णुचंद्र शर्मा की एक कविता),एक बांग्ला कविता(रंजीत कुमार रॉय)

मई२००७ : दो बांग्ला कविताएं(अनूप मुखर्जी),फूल कुछ नहीं बताएंगे(नरेश सक्सेना की एक कविता),उनके झगड़े के बीच एक मुर्गी गवाह थी(निशांत की एक कविता),बूढी औरत का एकांत(शुभा की एक कविता),समय की कमी थी बहुत(अल्पना मिश्रा की एक कविता),पढी हुई किताबें(राजीव कुमार शुक्ल),सत्य को लिया सत्य की तरह(मनीषा झा की एक कविता),केवल एक बात थी(कीर्ति चौधरी की एक कविता),कितनी ही पीड़ाएं हैं(गीत चतुर्वेदी की एक कविता),राजधानी में बैल:भाग १-६(उदयप्रकाश की कविता सीरीज़),असमंजस(भवानीप्रसाद मिश्र)

जून२००७ : स्त्रीवग्गो(ऋतुराज की एक कविता),चिट्ठियां रही हैं हमेशा मेरे घर में(राजेन्द्र उपाध्याय),आंखें(मंगलेश डबराल की एक कविता), विवेक ध्रुवतारा है(भवानीप्रसाद मिश्र की एक कविता),प्रियंकर की एक कविता(मेरा दुख),वृष्टि-छाया प्रदेश का कवि(प्रियंकर की एक कविता), हमने उनके घर देखे(भगवत रावत की एक कविता),रोटी और गुलाब(पवन मुखोपाध्याय की एक कविता),बरखास्त(मनमोहन की एक कविता), हमने चलती चक्की देखी(भगवत रावत का एक समूह गीत),नदियों को जोड़ने के पहले(रंजीत कुमार रॉय),हे गणनायक(राग तेलंग की एक कविता),चाहिए चाहिए चाहिए (श्यामल शील की एक बांग्ला कविता),अबके(भवानीप्रसाद मिश्र),तारों से भरा आसमान ऊपर(भवानी भाई)

जुलाई२००७ : अटपटा छंद(प्रियंकर की एक कविता),पूछती है मेरी बेटी(दिनेश कुशवाह),आना फ़ुरसतिया का(प्रियंकर),तिल का ताड़,झूलता झोपड़ा और सुनहला पहाड़(प्रियंकर),अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता(जीवन वृत्तांत),दियना(भवानी भाई),वृक्ष वे कविताएं हैं(खलील जिब्रान का गद्य-काव्य),बोधिसत्व की एक कविता(त्रिलोचन),नदी के आगे सिजदा(ज्योतिर्मय दास की बांग्ला कविता),विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता(कोई अधूरा पूरा नहीं होता),एक पड़ोसी की प्रार्थना में(विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता),विनय दुबे की एक कविता(मैं तो कविता लिखता हूं),न देने के वास्ते/न देने के लिए(अमिताभ गुप्त की एक बांग्ला कविता),शिक्षक महोदय(अमिताभ गुप्त की एक बांग्ला कविता), कुंवर नारायण की एक कविता(कभी पाना मुझे),राजकिशोर की एक कविता(साथ),शुभा की एक कविता(एकालाप)

अगस्त२००७ :प्रियंकर की एक कविता(दोनापावला की एक सांझ का अकेलापन),कुंवर नारायण की एक कविता(उदासी के रंग),संग-साथ(प्रियंकर की एक कविता),उठो(भवानी भाई),पेड़(योगेश अटल),देवीप्रसाद मिश्र की एक कविता(मामूली कविता),अधबने मकानों में खेलते बच्चे(रति सक्सेना की एक कविता),अशोक वाजपेयी की एक कविता(विश्वास करना चाहता हूं),जानना ज़रूरी है(इंदु जैन की एक कविता),मैं एक ठहरे हुए पल में जी रहा हूं(बसंत त्रिपाठी की एक कविता),औरतों की जेब क्यों नहीं होती(राग तेलंग की एक कविता),कुम्हार अकेला शख्स होता है(शहंशाह आलम की एक कविता),हरीशचंद्र पाण्डेय की एक कविता

तो यह रहा गए साल का लेखा-जोखा . कृपया बताएं आपको इस चिट्ठे में क्या अच्छा लगा और क्या नागवार गुज़रा . वे कौन सी कविताएं थीं जिन्होंने आपके मन को छुआ . वे कौन से कवि हैं जो आपको ज्यादा भाए तथा वे कौन से कवि और कविताएं हैं जिन्हें आप इस चिट्ठे पर देखना चाहते थे पर न देख सके .

आशा है आप स्नेह-संबंध बनाए रखेंगे और ‘अनहद नाद’ पर पहले की तरह आते रहेंगे . ‘अनहद नाद’ को  और बेहतर बनाने के लिए आपके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी .

शुभकामनाओं सहित,

आपका

प्रियंकर

 

August 16, 2007

हरीश चंद्र पाण्डेय की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:40 am

 

नया साल मुबारक हो

 

झाड़ियों के उलझाव से

बाहर निकलने की कोशिश में

बैलों के गले में बंधी घंटियां बोल उठीं

नया साल मुबारक हो

 

बिगड़ी गाड़ी को

बड़ी देर से ठीक करने में जुटा मैकेनिक

गाड़ी के नीचे से उतान स्वरों में ही बोला

नया साल मुबारक हो

 

बरसों से मंगली लड़का ढूंढते-ढूंढते परेशान मां-बाप को देख

नीबू के पत्ते की नोक पर ठिठकी

जनवरी की ओस ने कहा

नया साल मुबारक हो

 

कल बुलडोज़र की आसानी के लिए

आज घर को चिह्नित करते कर्मचारी को देख

घर का छोटा बच्चा दूर से ही बोला पंचम में

नया साल मुबारक हो अंकल

नया साल मुबारक हो ……….

 

**********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

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