अनहद नाद

August 1, 2007

प्रियंकर की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:34 am

 

दोना पावला की एक सांझ का अकेलापन

 

सागर
असीम है
अगाध है
मन को
भाता है
अपरिचय का सागर
दारुण है
दाहक है
मन अकुलाता है

कोई स्पर्श नहीं
सांत्वना का
कंधे पर नहीं
कोई विश्वासी हाथ
परिचय की नहीं
कोई स्निग्धता
नहीं कोई
स्नेही स्वजन साथ

एकाकीपन का
साथी है तो सागर –
हरहराता हुआ
आता है मेरे पास
कराता है
निकटता का अहसास
पूछता है
मेरे छोटे सुख
पूछता है
मेरे दारुण दु:ख
मेरी ही भाषा में

 

एकाएक
जी भर आता है
सागर
आंखों में लहराता है ।

 

 ……..

 

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