संग-साथ
प्रियंकर की एक कविता
संग-साथ
आज मन में
एक मंथन सा
चल रहा है
और तुमसे
मिलने को यह मन
मचल रहा है
बार-बार सोचता हूं
आदमी को आखिर
अकेले क्यों रहना चाहिए
सुख हो या दु:ख
एकाकी क्यों सहना चाहिए
जीवन की धारा में
अकेले क्यों बहना चाहिए
वह भी साथ-साथ
रहने की शपथ लेने के बाद
बहुत से अंधेरे-उजाले
एक-साथ सहने के बाद
अत:
आरंभिक अनुराग की
आवेगमयी स्मृति
को मान दो
और शीघ्र आओ
मेरे आतुर हाथों
में अपना गर्म हाथ लाओ
समय की कसौटी पर कसा
संग-साथ का
वही पुराना गीत गाओ ।
……..