अनहद नाद

August 3, 2007

संग-साथ

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प्रियंकर की एक कविता

 

संग-साथ

 

आज मन में
एक मंथन सा
चल रहा है
और तुमसे
मिलने को यह मन
मचल रहा है

 बार-बार सोचता हूं

आदमी को आखिर

अकेले क्यों रहना चाहिए

सुख हो या दु:ख
एकाकी क्यों सहना चाहिए
जीवन की धारा में
अकेले क्यों बहना चाहिए

वह भी साथ-साथ
रहने की शपथ लेने के बाद
बहुत से अंधेरे-उजाले
एक-साथ सहने के बाद

अत:
आरंभिक अनुराग की
आवेगमयी स्मृति
को मान दो
और शीघ्र आओ
मेरे आतुर हाथों
में अपना गर्म हाथ लाओ
समय की कसौटी पर कसा
संग-साथ का
वही पुराना गीत गाओ ।

      
 ……..

 

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