अनहद नाद

August 6, 2007

उठो

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:47 am

Bhavani bhai 

भवानी भाई की एक कविता

 

उठो

 

बुरी बात है

चुप मसान में बैठे-बैठे

दुःख सोचना , दर्द सोचना !

शक्तिहीन कमज़ोर तुच्छ को

हाज़िर नाज़िर रखकर

सपने बुरे देखना !

टूटी हुई बीन को लिपटाकर छाती से

राग उदासी के अलापना !

 

बुरी बात है !

उठो , पांव रक्खो रकाब पर

जंगल-जंगल नद्दी-नाले कूद-फांद कर

धरती रौंदो !

जैसे भादों की रातों में बिजली कौंधे ,

ऐसे कौंधो ।

 

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