पेड़
योगेश अटल की एक कविता
पेड़
हवा चली
चलती रही
मुझे गिराने को
पानी बरसा
बरसता रहा
मुझे मिटाने को
पर मैंने की शिकायत
न हवा से
न पानी से
मैंने अपनी जड़ों की पकड़
को मजबूत किया है
उनसे जो कुछ लेना था
चुपचाप लिया है
और भरा-पूरा जीवन जिया है ।
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कवि परिचय : प्रो० योगेश अटल अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के समाजशास्त्री और मानवविज्ञानी हैं तथा यूनेस्को के रीज़नल ऐडवाइज़र रहे हैं . हमारी पत्रिका ‘समकालीन सृजन’ से उनका एक लेखक के रूप में जुड़ाव रहा है . कल उनसे मिलना हुआ . वे ऐन्थ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में व्याख्यान देने कोलकाता आए हुए हैं .
बहुत अच्छी कविता है।
Comment by अनूप शुक्ल — August 7, 2007 @ 4:53 pm
सुन्दर विचार ! पेड़ और हममें से यदि एक को चुनना हो तो हम बहुत पीछे छूट जाएँगे ।
घुघूती बासूती
Comment by ghughutibasuti — August 7, 2007 @ 6:57 pm
बहुत बढ़िया. जड़ों से जुडे रहने की महत्ता दर्शाती एक सुंदर रचना. आभार इस प्रस्तुति का.
Comment by समीर लाल — August 7, 2007 @ 8:54 pm