रति सक्सेना की एक कविता
अधबने मकानों में खेलते बच्चे
अधबने मकानों के बीच
खेलते बच्चे
अनजाने में खोज रहे हैं
अपने-अपने घर
अधलगी खिड़की की चौखट से
झांक रहे हैं दुनिया के बाहर
बिना बनी छत पर
टांग रहे हैं अपना-अपना आसमान
मकानों की खोल में घुसने से पहले
घर की नींव को
भरने की कोशिश कर रहे हैं
खिलखिलाहटों से ।
*******
( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
बहुत सुंदर !!
चित्र सा खिंच गया आँखों के सामने…कभी इस तरह सोचा नहीं था।
By: Beji on August 9, 2007
at 7:17 am
मकानों की खोल में घुसने से पहले
घर की नींव को
भरने की कोशिश कर रहे हैं
खिलखिलाहटों से ।
बहुत खूब!
By: अनूप शुक्ल on August 10, 2007
at 12:53 am