Posted by: PRIYANKAR | August 9, 2007

अधबने मकानों में खेलते बच्चे

 

रति सक्सेना की एक कविता

 

अधबने मकानों में खेलते बच्चे

 

अधबने मकानों के बीच

खेलते बच्चे

अनजाने में खोज रहे हैं

अपने-अपने घर

 

अधलगी खिड़की की चौखट से

झांक रहे हैं दुनिया के बाहर

बिना बनी छत पर

टांग रहे हैं अपना-अपना आसमान

 

मकानों की खोल में घुसने से पहले

घर की नींव को

भरने की कोशिश कर रहे हैं

खिलखिलाहटों से ।

 

*******

 

( समकालीन सृजन   के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 


Responses

  1. बहुत सुंदर !!
    चित्र सा खिंच गया आँखों के सामने…कभी इस तरह सोचा नहीं था।

  2. मकानों की खोल में घुसने से पहले
    घर की नींव को
    भरने की कोशिश कर रहे हैं
    खिलखिलाहटों से ।

    बहुत खूब!


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