जानना ज़रूरी है
इंदु जैन की एक कविता
जानना ज़रूरी है
जब वक्त कम रह जाए
तो जानना ज़रूरी है कि
क्या ज़रूरी है
सिर्फ़ चाहिए के बदले चाहना
पहचानना कि कहां हैं हाथ में हाथ दिए दोनों
मुखामुख मुस्करा रहे हैं कहां
फ़िर इन्हें यों सराहना
जैसे बला की गर्मी में घूंट भरते
मुंह में आई बर्फ़ की डली ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
a gud one…
Comment by manya — August 13, 2007 @ 11:23 am
‘सिर्फ़ चाहिए के बदले चाहना’
अच्छी पंक्तियाँ हैं , किन्तु कहाँ समय रहते पता चलता है कि समय कम है ? यदि यह ही पता चल जाए तो बात ही क्या है ?
घुघूती बासूती
Comment by ghughutibasuti — August 13, 2007 @ 2:47 pm