शहंशाह आलम की एक कविता
कुम्हार अकेला शख्स होता है
जब तक एक भी कुम्हार है
इस पूरी पृथ्वी पर
और मिट्टी आकार ले रही है
समझो कि मंगलकामनाएं की जा रही हैं
कितना अच्छा लगता है
जबकि मंगलकामनाएं की जा रही हैं
और इस बदमिजाज़ व खुर्राट औरत-सी
सदी में भी
कुम्हार काम भर मिट्टी ला रहा है
कुम्हार जिस समय बीड़ी पीता है
बीवी उसकी आग तैयार करती है
इतिहासकार इतिहास के बारे में
चिंतित होते हैं
श्रेष्ठजन अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में
भिड़े होते हैं
अंधकार चीरने हेतु
अपने को तैयार कर रहा होता है कवि
कुम्हार अकेला शख्स होता है
जो पैदल-पुलिस के साथ
शिकारी कुत्तों की भीड़ देखकर
न तो बौखलाता है
न ही उत्तेजित होता है
हालांकि उसको पता है
उसके बनाए बर्तन
खिलौने कैमरामैन पुरुष-समूह अंतरिक्षयात्री
अबाबील व दूसरी चिड़िया
सब-सब
मौके की तलाश में हैं
किसी अन्य ग्रह पर चले जाने के लिए
कुम्हार अकेला शख्स होता है
जो नेपथ्य में बैठी उद्घोषिका से कहता है
हम मिट्टी से और मिट्टी के रंगवाली
पृथ्वी से प्रेम करते रहेंगे ।
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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )
जो भी रचता है – कोई भी हो, अकेला होता है.
By: ज्ञानदत्त पाण्डेय on August 15, 2007
at 11:50 am
वास्तव में कुम्हार महान है!
By: sitaram prajapati on February 7, 2009
at 6:51 pm