अनहद नाद

August 16, 2007

हरीश चंद्र पाण्डेय की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:40 am

 

नया साल मुबारक हो

 

झाड़ियों के उलझाव से

बाहर निकलने की कोशिश में

बैलों के गले में बंधी घंटियां बोल उठीं

नया साल मुबारक हो

 

बिगड़ी गाड़ी को

बड़ी देर से ठीक करने में जुटा मैकेनिक

गाड़ी के नीचे से उतान स्वरों में ही बोला

नया साल मुबारक हो

 

बरसों से मंगली लड़का ढूंढते-ढूंढते परेशान मां-बाप को देख

नीबू के पत्ते की नोक पर ठिठकी

जनवरी की ओस ने कहा

नया साल मुबारक हो

 

कल बुलडोज़र की आसानी के लिए

आज घर को चिह्नित करते कर्मचारी को देख

घर का छोटा बच्चा दूर से ही बोला पंचम में

नया साल मुबारक हो अंकल

नया साल मुबारक हो ……….

 

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( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

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