रघुवीर सहाय की एक कविता
रघुवीर सहाय (1929-1990)
अरे अब ऐसी कविता लिखो
अरे अब ऐसी कविता लिखो
कि जिसमें छंद घूमकर आय
घुमड़ता जाय देह में दर्द
कहीं पर एक बार ठहराय
कि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूं
वही दो बार शब्द बन जाय
बताऊं बार-बार वह अर्थ
न भाषा अपने को दोहराय
अरे अब ऐसी कविता लिखो
कि कोई मूड़ नहीं मटकाय
न कोई पुलक-पुलक रह जाय
न कोई बेमतलब अकुलाय
छंद से जोड़ो अपना आप
कि कवि की व्यथा हृदय सह जाय
थामकर हंसना-रोना आज
उदासी होनी की कह जाय ।
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( कवि की फोटो अनुभूति-हिंदी.ऑर्ग से साभार )

बढिया प्रस्तुति है।
Comment by paramjitbali — August 24, 2007 @ 6:02 pm
न कोई पुलक-पुलक रह जाय/ न कोई बेमतलब अकुलाय/ थामकर हंसना-रोना आज/उदासी होनी की कह जाय
ऐसी लिखें मगर क्यों लिखेंगे.. बिना पुलक-पुलक जाये बात निकलती कहां है..
Comment by pramos — August 24, 2007 @ 8:07 pm
आप लिखिये ऐसन कविता।
Comment by अनूप शुक्ल — August 25, 2007 @ 1:32 am
चख़ूब ! आभार ।
Comment by अफ़लातून — August 25, 2007 @ 2:10 am
सुन्दर और प्यारी सी कविता है ।
धन्यवाद
Comment by anoop bhargava — August 25, 2007 @ 2:28 am