Posted by: PRIYANKAR | August 24, 2007

रघुवीर सहाय की एक कविता

रघुवीर सहाय (1929-1990) 

 

अरे अब ऐसी कविता लिखो

 

अरे अब ऐसी कविता लिखो

कि जिसमें छंद घूमकर आय

घुमड़ता जाय देह में दर्द

कहीं पर एक बार ठहराय

 

कि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूं

वही दो बार शब्द बन जाय

बताऊं बार-बार वह अर्थ

न भाषा अपने को दोहराय

 

अरे अब ऐसी कविता लिखो

कि कोई मूड़ नहीं  मटकाय

न कोई पुलक-पुलक रह जाय

न कोई बेमतलब अकुलाय

 

छंद से जोड़ो अपना आप

कि कवि की व्यथा हृदय सह जाय

थामकर हंसना-रोना आज

उदासी होनी की कह जाय ।

 

***********

 

( कवि की फोटो अनुभूति-हिंदी.ऑर्ग   से साभार )

 


Responses

  1. बढिया प्रस्तुति है।

  2. न कोई पुलक-पुलक रह जाय/ न कोई बेमतलब अकुलाय/ थामकर हंसना-रोना आज/उदासी होनी की कह जाय
    ऐसी लिखें मगर क्‍यों लिखेंगे.. बिना पुलक-पुलक जाये बात निकलती कहां है..

  3. आप लिखिये ऐसन कविता।

  4. चख़ूब ! आभार ।

  5. सुन्दर और प्यारी सी कविता है ।

    धन्यवाद


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