अनहद नाद

August 27, 2007

लीलाधर जगूड़ी की एक कविता

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 10:36 am

 

Leeladhar Jagoori

प्रार्थना

 

फलो !

जब महंगे बेचे जाओ

तो तुरंत सड़ जाया करो

छूते ही या देखते ही ।

 

********

 

( काव्य संकलन ‘घबराये हुए शब्द’ से साभार )

 

2 Comments »

  1. आह्ह!!! यह कौन सा पहलू छू लिया. वाह.

    Comment by समीर लाल — August 28, 2007 @ 1:37 am

  2. एक मेरी भी छापें:

    हमने अमावस को चाँद देखा है……..

    वो खड़ी थीं।

    –समीर लाल ‘समीर’

    :)

    Comment by समीर लाल — August 28, 2007 @ 1:38 am

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