अनहद नाद

August 28, 2007

सेब बेचना

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 4:55 am

 

रघुवीर सहाय की एक कविता

 

सेब बेचना

 

मैंने कहा डपटकर

ये सेब दागी हैं

नहीं नहीं साहब जी

उसने कहा होता

आप निश्चिंत रहें

तभी उसे खांसी का दौरा पड़ गया

उसका सीना थामे खांसी यही कहने लगी ।

 

**********

 

( कवि की फोटो अनुभूति-हिंदी.ऑर्ग   से साभार )

 

4 Comments »

  1. वह समय कब आयेगा जब सेब बेचने वाला सेब खा भी सकेगा?

    Comment by ज्ञानदत पाण्डेय — August 28, 2007 @ 9:27 am

  2. ज्ञान दत्त जी के एक पंक्ति में सदियो का सवाल आ गया. धूमिल की कविता भी याद आयी रोटी वाली.

    Comment by बसंत आर्य — August 28, 2007 @ 11:34 am

  3. सच में-ज्ञानजी.

    Comment by समीर लाल — August 28, 2007 @ 4:13 pm

  4. कुछ ही शब्दों में कितना कुछ कह दिया ।
    घुघूती बासूती

    Comment by ghughutibasuti — August 28, 2007 @ 9:21 pm

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