Posted by: PRIYANKAR | August 28, 2007
सेब बेचना
रघुवीर सहाय की एक कविता
सेब बेचना
मैंने कहा डपटकर
ये सेब दागी हैं
नहीं नहीं साहब जी
उसने कहा होता
आप निश्चिंत रहें
तभी उसे खांसी का दौरा पड़ गया
उसका सीना थामे खांसी यही कहने लगी ।
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( कवि की फोटो अनुभूति-हिंदी.ऑर्ग से साभार )
वह समय कब आयेगा जब सेब बेचने वाला सेब खा भी सकेगा?
By: ज्ञानदत पाण्डेय on August 28, 2007
at 9:27 am
ज्ञान दत्त जी के एक पंक्ति में सदियो का सवाल आ गया. धूमिल की कविता भी याद आयी रोटी वाली.
By: बसंत आर्य on August 28, 2007
at 11:34 am
सच में-ज्ञानजी.
By: समीर लाल on August 28, 2007
at 4:13 pm
कुछ ही शब्दों में कितना कुछ कह दिया ।
घुघूती बासूती
By: ghughutibasuti on August 28, 2007
at 9:21 pm