Posted by: PRIYANKAR | August 28, 2007

सेब बेचना

 

रघुवीर सहाय की एक कविता

 

सेब बेचना

 

मैंने कहा डपटकर

ये सेब दागी हैं

नहीं नहीं साहब जी

उसने कहा होता

आप निश्चिंत रहें

तभी उसे खांसी का दौरा पड़ गया

उसका सीना थामे खांसी यही कहने लगी ।

 

**********

 

( कवि की फोटो अनुभूति-हिंदी.ऑर्ग   से साभार )

 


Responses

  1. वह समय कब आयेगा जब सेब बेचने वाला सेब खा भी सकेगा?

  2. ज्ञान दत्त जी के एक पंक्ति में सदियो का सवाल आ गया. धूमिल की कविता भी याद आयी रोटी वाली.

  3. सच में-ज्ञानजी.

  4. कुछ ही शब्दों में कितना कुछ कह दिया ।
    घुघूती बासूती


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