
लीलाधर जगूड़ी की एक कविता
तो
जब उसने कहा
कि अब सोना नहीं मिलेगा
तो मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ा
पर अगर वह कहता
कि अब नमक नहीं मिलेगा
तो शायद मैं रो पड़ता ।
*********
( काव्य संकलन ‘घबराये हुए शब्द’ से साभार )

लीलाधर जगूड़ी की एक कविता
तो
जब उसने कहा
कि अब सोना नहीं मिलेगा
तो मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ा
पर अगर वह कहता
कि अब नमक नहीं मिलेगा
तो शायद मैं रो पड़ता ।
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( काव्य संकलन ‘घबराये हुए शब्द’ से साभार )
Posted in कविताएं/Poems | Tags: लीलाधर जगूड़ी
बहुत बढिया रचना है।अच्छी रचना प्रेषित की है।
By: paramjitbali on August 29, 2007
at 6:48 am
मिलने न मिलने में
जोड़ दें पैसे:
अगर वो कहे
कि हवा के पैसे लगेंगे
तो सुन कर शायद मैं मर ही जाता.
(प्रियंकर जी, इसे विशुद्ध कमेण्ट मानें – लीलाधर जी से टक्कर लेती कविता करने की बेहूदा कोशिश नहीं!)
By: ज्ञानदत पाण्डेय on August 29, 2007
at 8:25 am
अगर वाह से भी अच्छा और असरदार शब्द हो तो
इस कविता के लिए मेरी ओर से वही शब्द कहा मान लें
By: yunus on August 29, 2007
at 1:02 pm
सही है.. पानी के तो ये हाल होने वाले हैं..
By: अभय तिवारी on August 29, 2007
at 1:03 pm
बहुत बढ़िया !
घुघूती बासूती
By: ghughutibasuti on August 29, 2007
at 8:33 pm