अनहद नाद

August 30, 2007

समयगंधा

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:20 am

 Bhavani bhai

भवानी भाई की एक कविता

 

समयगंधा

 

तुमसे मिलकर

ऐसा लगा जैसे

कोई पुरानी और प्रिय किताब

एकाएक फिर हाथ लग गई हो

 

या फिर पहुंच गया हूं मैं

किसी पुराने ग्रंथागार में

 

समय की खुशबू

प्राणों में भर गई

 

उतर आया भीतर

अतीत का चेहरा

 

बदल गया वर्तमान

शायद भविष्य भी ।

 

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