अनहद नाद

August 15, 2007

कुम्हार अकेला शख्स होता है

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 4:17 am

 

शहंशाह आलम की एक कविता

 

कुम्हार अकेला शख्स होता है

 

जब तक एक भी कुम्हार है

इस पूरी पृथ्वी पर

और मिट्टी आकार ले रही है

समझो कि मंगलकामनाएं की जा रही हैं

 

कितना अच्छा लगता है

जबकि मंगलकामनाएं की जा रही हैं

और इस बदमिजाज़ व खुर्राट औरत-सी

सदी में भी

कुम्हार काम भर मिट्टी ला रहा है

 

कुम्हार जिस समय बीड़ी पीता है

बीवी उसकी आग तैयार करती है

इतिहासकार इतिहास के बारे में

चिंतित होते हैं

श्रेष्ठजन अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में

भिड़े होते हैं

अंधकार चीरने हेतु

अपने को तैयार कर रहा होता है कवि

 

कुम्हार अकेला शख्स होता है

जो पैदल-पुलिस के साथ

शिकारी कुत्तों की भीड़ देखकर

न तो बौखलाता है

न ही उत्तेजित होता है

 

हालांकि उसको पता है

उसके बनाए बर्तन

खिलौने  कैमरामैन  पुरुष-समूह  अंतरिक्षयात्री

अबाबील व दूसरी चिड़िया

सब-सब

मौके की तलाश में हैं

किसी अन्य ग्रह पर चले जाने के लिए

 

कुम्हार अकेला शख्स होता है

जो नेपथ्य में बैठी उद्घोषिका से कहता है

हम मिट्टी से और मिट्टी के रंगवाली

पृथ्वी से प्रेम करते रहेंगे ।

 

***********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

August 14, 2007

औरतों की जेब क्यों नहीं होती

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:44 am

 

राग तैलंग की एक कविता

 

औरतों की जेब क्यों नहीं होती

 

यह कुसूर सिर्फ़ उनके पहनावे से जुड़ा हुआ नहीं है

न ही इतना भर कहने से काम चलने वाला कि क्योंकि वे औरतें हैं

जवाब भले दिखता किसी के पास न हो मगर

इस बारे में सोचना ज़रूरी है

 

जल्दी सोचो!

क्या किया जाए

दिनों-दिन बदलते ज़माने की तेज़ रफ़्तार के दौर में

जब पेन मोबाइल आई-कार्ड  लाइसेंस  और पर्स रखने की ज़रूरत आ पड़ी है

 

जब-जब रोज़मर्रा के काम निपटाने

वे घरों से बाहर निकलने लगी हैं तब

अलस्सुबह छोड़ने आती हैं बस स्टॉप पर बच्चों को

तालीम के हथियार की धार तेज़ करने के वास्ते तब

जाना चाहती हैं सजकर बाहर

संवरती हुई दुनिया को देखने के लिए तब

 

उम्मीद की जाती है उनसे कि

घर के तमाम कामों को समय पर समेटने के बाद भी

दिखें बाहर के मोर्चे पर भी बदस्तूर तैनात

वह भी बिना जेब में हाथ डाले

 

और ऐसे वक्त में भी उनसे वही पुरातन उम्मीद कि

वे खोंसे रहें चाबियां या तो कटीली कमर में

या फ़िर वक्षों के बीचों-बीच फंसाकर

निभाती चलती रहें पुरखों के जमाने से चले आ रहे जंग लगे दस्तूर

 

दिल पे हाथ रखो और बताओ

ऐसे में क्या यह सिर्फ़ आधुनिक दर्जियों और

जेबकतरों का दायित्व है कि वे सोचें कि

औरतों की जेब क्यों नहीं होती ?

या फिर इस बारे में

हमें भी कुछ करने की ज़रूरत है ।

 

********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

August 13, 2007

मैं एक ठहरे हुए पल में जी रहा हूं

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 2:38 pm

 

बसंत त्रिपाठी की एक कविता

 

मैं एक ठहरे हुए पल में जी रहा हूं

 

मैं एक ठहरे हुए पल में जी रहा हूं

कवि हूं

 

खादी पहनता हूं, बहस करता हूं

फ़िल्में देखता हूं, शराब पीता हूं

बचे समय में अपनी कारगुजारियों को

सही साबित करने की कवायद करता हूं

 

मैं एक ठहरे हुए पल में जी रहा हूं

यद्यपि कुछ भी ठहरा हुआ नहीं

तेजी से घूम रहे लहू के आभासी ठहराव जैसा है यह

 

फूल  प्यार  बच्चे  और चिड़िया

चिट्ठियां और कविताएं

अपने समय की समस्त बुरी घटनाएं और दुश्चिंताएं

रक्त के भीतर बड़बड़ाता कोई पुराना संस्कार

सब कुछ मिलकर इतना एक हो गया है

कि डरावने सपने आते हैं

मैं डरावने सपने देखते हुए

अपना मकान बनवाना स्थगित करता हूं

बौखलाहट और नकार अब बीते दिनों की चीज़ है

सब कुछ पर केवल हामी है

कुछ न करने के दाखिल प्रतिज्ञा-पत्रों के बीच

कहीं मैं भी हूं

 

बगदाद और बसरा की सड़कों पर

कैमरे की आंख से बचता हुआ

भारत में आम की लकड़ी की मेज पर झुका हुआ

कर्ज़ की किस्तों के भयंकर चक्रवात में घिरा हुआ

अपने समय का एक मामूली-सा कवि यानी मैं

शांत मुद्रा में अशांत समय की कविताएं लिखता हूं

 

कविता लिखने के सबसे ज़रूरी समय में

कविता लिखते हुए

मैं इतना अकेला और हताश हूं

कि कहता हूं — मैं एक ठहरे हुए पल में जी रहा हूं ।

 

*****

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

जानना ज़रूरी है

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:51 am

 

इंदु जैन की एक कविता

 

जानना ज़रूरी है

 

जब वक्त कम रह जाए

तो जानना ज़रूरी है कि

क्या ज़रूरी है

 

सिर्फ़ चाहिए के बदले चाहना

पहचानना कि कहां हैं हाथ में हाथ दिए  दोनों

मुखामुख मुस्करा रहे हैं कहां

 

फ़िर इन्हें यों सराहना

जैसे बला की गर्मी में घूंट भरते

मुंह में आई बर्फ़ की डली ।

 

***********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

August 10, 2007

अशोक वाजपेयी की एक कविता

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 6:13 am

अशोक वाजपेयी

विश्वास करना चाहता हूं

 

विश्वास करना चाहता हूं कि

जब प्रेम में अपनी पराजय पर

कविता के निपट एकांत में विलाप करता हूं

तो किसी वृक्ष पर नए उगे किसलयों में सिहरन होती है

बुरा लगता है किसी चिड़िया को दृश्य का फिर भी इतना हरा-भरा होना

किसी नक्षत्र की गति पल भर को धीमी पड़ती है अंतरिक्ष में

पृथ्वी की किसी अदृश्य शिरा में बह रहा लावा थोड़ा बुझता है

सदियों के पार फैले पुरखे एक-दूसरे को ढाढ़स बंधाते हैं

देवताओं के आंसू असमय हुई वर्षा में झरते हैं

मैं रोता हूं

तो पूरे ब्रह्मांड में

झंकृत होता है दुख का एक वृंदवादन –

पराजय और दुख में मुझे अकेला नहीं छोड़ देता संसार

 

दुख घिरता है ऐसे

जैसे वही अब देह हो जिसमें रहना और मरना है

जैसे होने का वही असली रंग है

जो अब जाकर उभरा है

 

विश्वास करना चाहता हूं कि

जब मैं विषाद के लंबे-पथरीले गलियारे में डगमग

कहीं जाने का रास्ता खोज रहा होता हूं

तो जो रोशनी आगे दिखती है दुख की है

जिस झरोखे से कोई हाथ आगे जाने की दिशा बताता है वह दुख का है

और जिस घर में पहुंचकर,जिसके ओसारे में सुस्ताकर,आगे चलने की हिम्मत बंधेगी

वह दुख का ठिकाना है

 

विश्वास करना चाहता हूं कि

जैसे खिलखिलाहट का दूसरा नाम बच्चे और फूल हैं

या उम्मीद का दूसरा नाम कविता

वैसे ही प्रेम का दूसरा नाम दुख है ।

 

**********

 

( समकालीन सृजन   के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

August 9, 2007

अधबने मकानों में खेलते बच्चे

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 5:54 am

 

रति सक्सेना की एक कविता

 

अधबने मकानों में खेलते बच्चे

 

अधबने मकानों के बीच

खेलते बच्चे

अनजाने में खोज रहे हैं

अपने-अपने घर

 

अधलगी खिड़की की चौखट से

झांक रहे हैं दुनिया के बाहर

बिना बनी छत पर

टांग रहे हैं अपना-अपना आसमान

 

मकानों की खोल में घुसने से पहले

घर की नींव को

भरने की कोशिश कर रहे हैं

खिलखिलाहटों से ।

 

*******

 

( समकालीन सृजन   के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

August 8, 2007

देवीप्रसाद मिश्र की एक कविता

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 5:01 am

 

मामूली कविता

रमन मिश्र के लिए

 

एक मामूली कविता लिखने का

मज़ा ही कुछ और है एक ऐसी कविता

जो अंगूठे के बारे में हो या

अचानक शुरू हो गई शाम के बारे में

या किसी स्टेशन के बारे में जिससे

होकर आप कभी गुज़रे थे या

एक ऐसे बड़े-से गेट के लोहे के बारे में

जिसको छूकर ये लगता था कि

जीवन में नहीं बची है कोमलता

 

एक मामूली कविता उन

दोस्तों के बारे में भी लिखी जा सकती है

जो चाय का इंतज़ार करते हुए बैठे होते हैं

एक दूसरे को देखते हुए

और ये सोचते हुए कि मृत्यु

हम सबके लिए भी है

 

मामूली कविता में समकालीनता

के किसी कोने में पड़े रहने का

अनोखापन होता है हाशिये पर

बने रहने का चयन

केन्द्र में होने की

निर्लज्जता से निजात पाने

की हिकमत कि जैसे

किसी ने दरवाजे पर खाट

डालने का फ़ैसला किया हो ज्यादा

आसमान और ज्यादा हवा के लिए

घर की सुरक्षा से ऊबकर

 

यह डायरी

लिखने जैसा होता है —   शैलीविहीन

कुछ मामूली वाक्य कि जिनका कर्ता

लापता हो और कुछ क्रियाओं से ही

चला लिया गया हो काम

 

एक मामूली कविता लिखने का मज़ा

इसलिए भी है कि वो किसी

पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं

बनेगी और न ही अमर बनाने में निभाएगी कोई

भूमिका उस पर पुरस्कार भी नहीं दे पाएगा

ताकतवर साहित्यिकों का कोई गिरोह ।

 

***********

 

( समकालीन सृजन के ‘कविता इस समय’ अंक से साभार )

 

August 7, 2007

पेड़

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:15 am

 योगेश अटल की एक कविता

 

पेड़ 

 

हवा चली

चलती रही

मुझे गिराने को

पानी बरसा

बरसता रहा

मुझे मिटाने को

 

पर मैंने की शिकायत

न हवा से

न पानी से

 

मैंने अपनी जड़ों की पकड़

को मजबूत किया है

उनसे जो कुछ लेना था

चुपचाप लिया है

और भरा-पूरा जीवन जिया है ।

 

**********

 

कवि परिचय : प्रो० योगेश अटल अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के  समाजशास्त्री और  मानवविज्ञानी हैं तथा यूनेस्को के रीज़नल ऐडवाइज़र रहे हैं . हमारी पत्रिका ‘समकालीन सृजन’ से उनका एक लेखक के रूप में जुड़ाव रहा है . कल उनसे मिलना हुआ . वे ऐन्थ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में व्याख्यान देने कोलकाता आए हुए हैं .

August 6, 2007

उठो

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 10:47 am

Bhavani bhai 

भवानी भाई की एक कविता

 

उठो

 

बुरी बात है

चुप मसान में बैठे-बैठे

दुःख सोचना , दर्द सोचना !

शक्तिहीन कमज़ोर तुच्छ को

हाज़िर नाज़िर रखकर

सपने बुरे देखना !

टूटी हुई बीन को लिपटाकर छाती से

राग उदासी के अलापना !

 

बुरी बात है !

उठो , पांव रक्खो रकाब पर

जंगल-जंगल नद्दी-नाले कूद-फांद कर

धरती रौंदो !

जैसे भादों की रातों में बिजली कौंधे ,

ऐसे कौंधो ।

 

*********

 

August 3, 2007

संग-साथ

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:25 pm

प्रियंकर की एक कविता

 

संग-साथ

 

आज मन में
एक मंथन सा
चल रहा है
और तुमसे
मिलने को यह मन
मचल रहा है

 बार-बार सोचता हूं

आदमी को आखिर

अकेले क्यों रहना चाहिए

सुख हो या दु:ख
एकाकी क्यों सहना चाहिए
जीवन की धारा में
अकेले क्यों बहना चाहिए

वह भी साथ-साथ
रहने की शपथ लेने के बाद
बहुत से अंधेरे-उजाले
एक-साथ सहने के बाद

अत:
आरंभिक अनुराग की
आवेगमयी स्मृति
को मान दो
और शीघ्र आओ
मेरे आतुर हाथों
में अपना गर्म हाथ लाओ
समय की कसौटी पर कसा
संग-साथ का
वही पुराना गीत गाओ ।

      
 ……..

 

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