शबरी घोष की एक बांग्ला कविता
अनुवाद : समीर रायचौधुरी
जो स्वप्न पूरे नहीं हुए
मैं तुम्हें तीर्थ घुमाने ले जाऊंगी मां
गोमुख की पवित्र धारा में छोड आऊंगी तुम्हारी अस्थियां
तुम्हारे विश्वास और तुम्हारा अन्तिम सपना …
अगर पुनर्जन्म है मां
तब फिर लौटना मेरी गोद में बेटी बनकर
तुम्हारी नादान उंगलियों को पकड़
तुम्हें सिखाऊंगी चलना
पहचान कराऊंगी नदी आकाश मनुष्य और उनके संबंधों से —
पहचान लोगी उस आग को जो चूल्हे की आंच से अधिक महान है —
जानोगी चारदीवारी के बाहर
तुम्हारी प्रतीक्षा में है विश्व — भुवन …
मेरे जो सपने पूरे नहीं हुए
उन्हें किसी तीर्थ के पानी में प्रवाहित नहीं कर दूंगी
अपने सपनों को प्रज्ज्वलित कर दूंगी तुम्हारी आंखों में
जो भोर के आकाश जैसी हैं ।
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कवयित्री परिचय : १९५५ में जन्म ; कवि-कहानीकार ; तीन काव्यग्रंथ ; एक अनूदित काव्य संकलन भी .
अनुवादक परिचय : बांग्ला के वरिष्ठ कवि-कहानीकार ; बांग्ला लघु पत्रिका ‘हवा ४९’ के यशस्वी सम्पादक
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