अपमान
भवानी भाई की एक कविता
अपमान
अपमान का
इतना असर
मत होने दो अपने ऊपर
सदा ही
और सबके आगे
कौन सम्मानित रहा है भू पर
मन से ज्यादा
तुम्हें कोई और नहीं जानता
उसी से पूछकर जानते रहो
उचित-अनुचित
क्या-कुछ
हो जाता है तुमसे
हाथ का काम छोड़कर
बैठ मत जाओ
ऐसे गुम-सुम से !
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बहुत अच्छा लगा यह कविता पढ़कर!
Comment by अनूप शुक्ल — September 4, 2007 @ 8:05 am
बढ़िया कविता…प्रेरणा देतें है ऎसे कवि….धन्यवाद
Comment by reetesh gupta — September 4, 2007 @ 12:17 pm
अच्छी रही रचना पढ़्कर अनुभूति. आभार.
Comment by समीर लाल — September 4, 2007 @ 1:16 pm
क्या बात है । भवानी दादा की कविताओं की बारिश हो रही है । आनंद परम आनंद ।
Comment by yunus — September 4, 2007 @ 1:31 pm
हाथ के काम का महत्व समझाया , अपनी सरल,सहज ,अनूठी शैली में ।आभार ।
Comment by अफ़लातून — September 4, 2007 @ 4:28 pm
सरल शब्द और सच !
..इसे कहते हैं कविता !
– लावान्या
Comment by लावण्या — September 5, 2007 @ 3:47 am