Posted by: PRIYANKAR | September 5, 2007

रघुवीर सहाय की एक कविता

  

दर्द

 

देखो शाम घर जाते बाप के कंधे पर

बच्चे की ऊब देखो

उसको तुम्हारी अंग्रेज़ी कह नहीं सकती

और मेरी हिंदी भी कह नहीं पाएगी

अगले साल ।

 

*********

 


Responses

  1. यह अंग्रेजी हिन्दी के बीच झूलता बचपन

    अंतत:
    एक बायें हाथ से लिखने वाले को
    जबरन दायें हाथ का बनाये जाने की त्रासदी
    झेलने जैसा
    अभिशाप झेलता है!

  2. बढ़िया है!

  3. जी बहुत अच्छा। कितनी बात छिपी है इस कविता में

  4. एक पहेली मेरा जीवन
    एक तेरी यह कविता है.
    जीवन ही सब सिखलायेगा
    जो पावन एक सरिता है.

    –गहरे भाव!!

  5. बहुत अच्छी कविता पेश की आपने
    धन्यवाद

  6. you have written an very good poem. i want to comment in hindi but i don’t know typing of hindi. But well done this poem is touching my heart.


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