प्रियंकर की एक कविता

शुभकामनाएं
आस्था
यदि शब्द पर हो
काव्य पर हो
सृजन पर हो
तो व्यक्ति पर भी
होनी लाज़िमी है
अन्यथा
आस्था में स्नेह में
शुभकामना में
अवश्य कोई
कमी है
विश्वासरहित
शुभकामनाएं
शब्द हैं खोखले
और निष्प्राण
निरी छलना है
अशुद्ध मंत्रों वाले
यज्ञ में
अपवित्र समिधाओं का
जलना है
भावनाएं यदि
सत्यता की
सौगंध लिए
घूंघट खोलना ही चाहती हों
तो उनका उचित
सम्मान भी होना चाहिए
शुभकामनाएं
यदि अन्तर्मन से हों
तो उन पर नाम भी
होना चाहिए ।
*****
आस्था, विश्वास और सत्य .. वाह तीन बंदों में व्यक्त भावनाएं .. बढ़िया रचना.
Comment by नीरज दीवान — September 6, 2007 @ 2:13 pm
सच्ची कविता। अच्छी कविता।
Comment by अनूप शुक्ल — September 6, 2007 @ 2:40 pm
१. कविता बहुत सोचने को बाध्य करती है.
२. पर बहुधा प्रारम्भ एक ऊबाऊ बोरियत और उदास प्रक्रिया से होता है. एक पतली सी डोर जुड़ी रहती है. शब्द भी नहीं होते. भाव तो और बाद में आते हैं.
३. फ़िर अचानक ऊष्मा का प्रचण्ड प्रवाह चलने लगता है. अशुद्ध मन्त्र कहने वाला अध्वर्यु बन जाता है - प्रबल और प्रकाण्ड विद्वान. समय सब उलट-पलट करता रहता है.
४. मैं यह सब देखता हूं और कभी चमत्कृत होता हूं तो कभी विचलित! यह आपकी कविता से इतर अनुभूति लगती है. सच क्या है - पता नहीं.
Comment by ज्ञानदत्त पाण्डेय — September 6, 2007 @ 3:09 pm
बहुत अच्छा लिखा है ।
Comment by anoop bhargava — September 6, 2007 @ 4:18 pm
अच्छी कविता और अच्छे विचार हैं
Comment by बोधिसत्व — September 6, 2007 @ 4:28 pm
इन सुन्दर भावों पर ‘अनामदासों’ की राय जानने की उत्सुकता लाजमी है !
Comment by अफ़लातून — September 6, 2007 @ 5:00 pm
प्रियंकर भाई
आपने मेरा अनुरोध माना, अच्छा लगा. अच्छी कविता.
Comment by anamdasblogger — September 6, 2007 @ 6:31 pm
जी बहुत ही अच्छी कविता लगी। हिन्दी भाषा की पकड़ बहुत ही मन भाई।
Comment by neeshooalld — September 6, 2007 @ 6:34 pm
बार-बार पढी़ बहुत अच्छी लगी…
सुनीता(शानू)
Comment by sunita(shaanoo) — September 6, 2007 @ 7:16 pm
[...] प्रियंकर बस यूं हीPopularity: 2% [?]Share This (1 votes, average: 5 out of 5) Loading … [...]
Pingback by फुरसतिया » अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे — September 7, 2007 @ 8:39 am
फुरसतिया जी के यहाँ पढ़ी, फिर यहाँ पढ़ी. शाम को फिर पढ़ेंगे यानि इतनी पसंद आई. बहुत बधाई.
Comment by समीर लाल — September 7, 2007 @ 2:13 pm
‘अशुद्ध मंत्रों वाले यज्ञ में अपवित्र समिधाओं का जलना ‘
प्रियंकर जी , बहुत सुंदर कविता है। सरल-तरल भाषा में सच्ची बानी आनंदित कर गई ।
इसे बड़ी मशक्कत के बाद अब पढ पाया हूं। कल से लगा हुआ था, मगर साइट नहीं खुल रही थी।
अच्छी कविता पढ़वाने के लिए शुक्रिया।
Comment by अजित वडनेरकर — September 7, 2007 @ 6:58 pm
प्रियंकर जी, इस कविता में लगी फोटो आपकी है या डॉयचे वेले में काम करनेवाले उज्ज्वल भट्टाचार्य की?
Comment by अनिल रघुराज — September 14, 2007 @ 9:42 am
अनिल रघुराज : अनिल भाई! फोटो तो मेरी ही है . पिछली दार्जिलिंग यात्रा की . लगता है उज्ज्वल भट्टाचार्य से मिलती-जुलती है .
Comment by प्रियंकर — September 17, 2007 @ 5:08 am