अनहद नाद

September 7, 2007

जो स्वप्न पूरे नहीं हुए

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:50 pm

शबरी घोष की एक बांग्ला कविता

अनुवाद : समीर रायचौधुरी

 

जो स्वप्न पूरे नहीं हुए

 

मैं तुम्हें तीर्थ घुमाने ले जाऊंगी मां

गोमुख की पवित्र धारा में छोड आऊंगी तुम्हारी अस्थियां

तुम्हारे विश्वास और तुम्हारा अन्तिम सपना …

 

अगर पुनर्जन्म है मां

तब फिर लौटना मेरी गोद में बेटी बनकर

तुम्हारी नादान उंगलियों को पकड़

तुम्हें सिखाऊंगी चलना

पहचान कराऊंगी नदी  आकाश  मनुष्य  और  उनके संबंधों से —

पहचान लोगी उस आग को  जो चूल्हे की आंच से अधिक महान है —

जानोगी चारदीवारी के बाहर

तुम्हारी प्रतीक्षा में है विश्व   —  भुवन …

 

मेरे जो सपने पूरे नहीं हुए

उन्हें किसी तीर्थ के पानी में प्रवाहित नहीं कर दूंगी

अपने सपनों को प्रज्ज्वलित कर दूंगी तुम्हारी आंखों में

जो भोर के आकाश जैसी हैं ।

 

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कवयित्री परिचय : १९५५ में जन्म ; कवि-कहानीकार ; तीन काव्यग्रंथ ; एक अनूदित काव्य संकलन भी .

अनुवादक परिचय : बांग्ला के वरिष्ठ कवि-कहानीकार ; बांग्ला लघु पत्रिका ‘हवा ४९’ के यशस्वी सम्पादक

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3 Comments »

  1. यह पुनर्जन्म और सन्तति के माध्यम से अनन्त तक जीने की सम्भावना हिदू धर्म का सबसे बड़ा प्लस प्वाइण्ट है. पता नहीं शबरी घोष एक सन्यासी के विषय में कैसे कविता लिखतीं. पर जो लिखा है वह पढ कर अच्छा लगता है.

    Comment by ज्ञानदत्त पाण्डेय — September 8, 2007 @ 1:14 am

  2. बढिया रचना प्रेषित की है।बहुत सुन्दर रचना है।
    मेरे जो सपने पूरे नहीं हुए

    उन्हें किसी तीर्थ के पानी में प्रवाहित नहीं कर दूंगी

    अपने सपनों को प्रज्ज्वलित कर दूंगी तुम्हारी आंखों में

    जो भोर के आकाश जैसी हैं ।

    Comment by paramjitbali — September 8, 2007 @ 7:07 am

  3. कविता याद दिलाती है- भारतीय दर्शन और गीता के साथ मां का प्रेम।

    Comment by आभा — September 10, 2007 @ 6:39 pm

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