प्रियंकर की एक कविता

आदमकद
मेरी कविता का
विषय है महानगर का
एक आदमकद व्यक्तित्व
जिसके भीतर जिन्दा हैं
खेत-खलिहान-चौपाल
एक पुश्तैनी घर और चौबारा
यानी अजनबी चेहरों की भीड़ नहीं
समस्याओं से जूझता गांव सारा
उसके अन्दर बहती है स्नेह की गंगा
वह आस्थाओं का विशाल बरगद है
कि उसकी छाया तले
हर व्यक्ति निरापद है
शहर के आवरण वाले लिफाफों में
वह अकेला पोस्टकार्ड है
जिसे आप बेखटके बांच सकते हैं
व्यक्ति एक - दो का नहीं
हर खास-ओ-आम का
सुख-दु:ख जांच सकते हैं
जिस दिन उस आदमी के
भीतर का गांव मर जायेगा
वह शख्स मेरी कविता का
विषय नहीं रह जायेगा
ज़िन्दगी की भेड़चाल में
जो व्यक्ति बच्चों-सी
खालिस हंसी हंस सकता है
कामरूप को पछाड़ने वाली
इस मायानगरी में
पारदर्शी बना रह सकता है
वह बदलेगा कैसे ?
आसमान भी छू ले
वह आदमी
दो को ‘दू’ ही कहेगा
दुनिया लादना चाहेगी
उस पर अपना अभिजात्य
वह खुली किताब की तरह रहेगा
आइये !
अस्ताचल की ओर जाते
इस आलोकवाही सूर्य को
सम्मान दें — एक विदा गीत गायें
और सूर्य के ऐसे ही
उगते रहने के विश्वास के साथ
जीवन-समर में धंस जायें ।
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