नया साल
शैलेन्द्र की एक कविता
नया साल
देर रात पटाखे छूटे
टकराए जाम से जाम
चुंबनों के दौर चले
थिरके कई-कई पांव
चहल-पहल जारी रही
लगे जिस्मों के दाम
बड़े-बड़े सट्टे लगे
फिटे साहब-बीबी-गुलाम
दुल्हन-सी सजी रात का किस्सा
इस तरह हुआ तमाम !
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कवि परिचय : जनसत्ता के कोलकाता संस्करण के प्रभारी सम्पादक . तीन काव्य संकलन प्रकाशित .
साल के अंत की तैयारी अभी से!
Comment by अनूप शुक्ल — September 12, 2007 @ 1:32 pm