Posted by: PRIYANKAR | September 13, 2007

एक बुढिया का इच्छागीत

लीलाधर जगूड़ी की एक कविता

 

एक बुढिया का इच्छागीत

 

जब मैं लगभग बच्ची थी

हवा कितनी अच्छी थी

 

घर से जब बाहर को आयी

लोहार ने मुझे दरांती दी

उससे मैंने घास काटी

गाय ने कहा दूध पी

 

दूध से मैंने, घी निकाला

उससे मैंने दिया जलाया

दीये पर एक पतंगा आया

उससे मैंने जलना सीखा

 

जलने में जो दर्द हुआ तो

उससे मेरे आंसू आये

आंसू का कुछ नहीं गढाया

गहने की परवाह नहीं थी

 

घास-पात पर जुगनू चमके

मन में मेरे भट्ठी थी

मैं जब घर के भीतर आयी

जुगनू-जुगनू लुभा रहा था

इतनी रात इकट्ठी थी ।

 

*******

 


Responses

  1. आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
    ऎसेही लिखेते रहिये.
    क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
    जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

  2. अच्छी कविता पढ़वाने के लिये शुक्रिया।

  3. सरल कविता पारा बेहद सुन्दर !

  4. आभार मित्र. इस प्रस्तुति के लिये.

  5. बहुत ख़ूब


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