अनहद नाद

September 13, 2007

एक बुढिया का इच्छागीत

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:04 am

लीलाधर जगूड़ी 

लीलाधर जगूड़ी की एक कविता

 

एक बुढिया का इच्छागीत

 

जब मैं लगभग बच्ची थी

हवा कितनी अच्छी थी

 

घर से जब बाहर को आयी

लोहार ने मुझे दरांती दी

उससे मैंने घास काटी

गाय ने कहा दूध पी

 

दूध से मैंने, घी निकाला

उससे मैंने दिया जलाया

दीये पर एक पतंगा आया

उससे मैंने जलना सीखा

 

जलने में जो दर्द हुआ तो

उससे मेरे आंसू आये

आंसू का कुछ नहीं गढाया

गहने की परवाह नहीं थी

 

घास-पात पर जुगनू चमके

मन में मेरे भट्ठी थी

मैं जब घर के भीतर आयी

जुगनू-जुगनू लुभा रहा था

इतनी रात इकट्ठी थी ।

 

*******

 

5 Comments »

  1. आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
    ऎसेही लिखेते रहिये.
    क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
    जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

    Comment by Deepanjali — September 13, 2007 @ 12:25 pm

  2. अच्छी कविता पढ़वाने के लिये शुक्रिया।

    Comment by अनूप शुक्ल — September 13, 2007 @ 3:13 pm

  3. सरल कविता पारा बेहद सुन्दर !

    Comment by लावण्या — September 13, 2007 @ 3:54 pm

  4. आभार मित्र. इस प्रस्तुति के लिये.

    Comment by समीर लाल — September 14, 2007 @ 12:22 am

  5. बहुत ख़ूब

    Comment by दीपक श्रीवास्तव — September 15, 2007 @ 9:52 am

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a comment

Blog at WordPress.com.