अनहद नाद

September 20, 2007

प्रियंकर की एक कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:34 am

Priyankar

प्रेम पत्र

 

कागज की नाव पर
तुम नहीं आ सकतीं
पर आ सकते हैं
तुम्हारे शब्द
नि:शब्द

सुबह की उजली
नर्म धूप की तरह
मन के आंगन में
उतर आता है
तुम्हारा स्नेह
कुछ यूं कि
जैसे झरते हों
रजनीगंधा के सूखे फूल
आहिस्ता से

 

फूल शुभकामना के
जिन्हें तुम
भेजती हो धड़कते हृदय से
मैं भी स्वीकारता हूं
कंपकंपाती अंजुरियों से ही

स्वीकार्य के बाद ही
तो आती है वह शक्ति      

जिसके लिए विख्यात हैं
मनु के वंशज

 

स्नेह का स्वीकार्य
ही तो हर सकता है
जीवन के सब
दाह दंश पीड़ा और शूल
स्नेह का स्वीकार्य ही तो
सिखा सकता है
बहना धारा के प्रतिकूल

आज समझा हूं
अभिव्यक्ति की
इस सच्चाई को 
कि क्षण चाहे अजर-अमर
न भी हों
पूर्ण होते हैं
सेतु चाहे कागज के हों
महत्वपूर्ण होते हैं ।

 

जब सब कुछ सीमाओं में कैद हो
तब भी  आ सकते हैं
बिना किसी पारपत्र के
मेरे ठोस शब्दों के उत्तर में
तुम्हारे वे तरल शब्द
मेरे जटिल प्रश्नों के उत्तर में
तुम्हारे वे सरल शब्द ।
  

     ********

 

Older Posts »

Blog at WordPress.com.