Posted by: PRIYANKAR | September 27, 2007

कुंवर नारायण की एक कविता

यकीनों की जल्दबाज़ी से

 

एक बार खबर उड़ी

कि कविता अब कविता नहीं रही

और यूं फैली

कि कविता अब नहीं रही !

 

यकीन करनेवालों ने यकीन कर लिया

कि कविता मर गई

लेकिन शक करने वालों ने शक किया

कि ऐसा हो ही नहीं सकता

और इस तरह बच गई कविता की जान

 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ

कि यकीनों की जल्दबाज़ी से

महज़ एक शक ने बचा लिया हो

किसी बेगुनाह को ।

 

*******

 


Responses

  1. खूबसूरत अहसास.

  2. कभी गाड़ी नाव पर

    कभी नाव गाड़ी पर
    बस गनीमत है – बच निकलते हैं
    कभी यकीन से और
    कभी शक से!
    ————–

    सोचने को कुरेदती अच्छी कविता.

  3. दुनियां
    कैसी हो गयी है कि;
    किसी को बचाने के लिए
    शक सामने आता है
    ऎसी परिस्थिति पर
    यकीन नहीं आता है

    बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति.

  4. एक सशक्त कविता पढ़ाने के लिए धन्यवाद ।

  5. ACHCHA HAI. AAPAKA KAM OUR KUNVAR JI KI KAVITA.
    KAMANA HAI- KAVITA BACHI RAHE. SAMBEDANA BACHI RAHE OUR BACHI RAHE INSANIYAT…

  6. बहुत बहुत धन्यवाद जी,
    कॊशिश करूँगा कि हर दिन आप का चिट्ठा पढूँ और टिप्पणी भी करूँ। आप मेरी संरचनात्मक त्रुटियाँ दीजिएगा, यही मेरी प्रार्थना है।


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