अनहद नाद

October 30, 2007

तुमुलिनी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 1:11 pm

प्रणव पाल की एक बांग्ला कविता

अनुवाद : समीर रायचौधुरी

 

तुमुलिनी

 

कहीं कुछ हलचल है

आंखों से हरेपन को उतारती    पीचवाली सड़क पर जंगल की सहेली …

सुरीले कंठ से होकर उतर रही है जो भरी हुई नदी

जो अम्पायर लिख रहा है गैलरी की रुलाई,उसकी सीमाओं को तोड़ दो

तुम्हें पता है गेंद का रहस्य ?

बज उठेंगे मैदान के पांव, क्रिकेट की पिच …

 

धूप भरी इस दोपहर में ऊंघती परछाईं से ढंक रहे हो चेहरे को

राजनीति के जनानेपन को छोड़ो, आंचल की कला को बचाओ

महाकाश तुम्हारे दोनों हाथों में फंसा है ।

 

रिक्शे पर चढने से पहले जान लो पैडल का दुख

साइकिल का खाली कैरियर

अपने प्रभु को पुकार रहा है …

कीर्तनियों की लय में गाता है पदावली

पुल को पार करती दूर जा रही हैं रिक्शे की विलासिताएं ।

 

******

 

( बांग्ला लघु पत्रिका हवा ४९ के पोस्ट-मॉडर्न बांग्ला पोएट्री पर  केन्द्रित अंक ‘अधुनान्तिक बांग्ला कविता’ से साभार )  

 

1 Comment »

  1. रिक्शे पर चढने से पहले जान लो पैडल का दुख

    साइकिल का खाली कैरियर

    मार्मिक कविता….

    Comment by बोधिसत्व — October 30, 2007 @ 4:50 pm

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a comment

Blog at WordPress.com.