अनहद नाद

November 8, 2007

स्मृति के शिलालेख

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 9:48 am

Priyankar  

प्रियंकर की एक कविता 

 

 स्मृति के शिलालेख

मदन चाचा के लिए

 

रेत के इस महासमुद्र में
कुछ द्वीप हैं–  आस्था के ध्यान के
इस बियाबान रेगिस्तान में
बोधिवृक्ष हैं– सत्य के ज्ञान के
यह सच है कि
उनकी अमरता हेतु अंधकूपों में
कालपात्र नहीं गड़े हैं
पर उनकी कालजयी स्मृतियों के शिलालेख
मन की दराज़ों में जड़े हैं

वे आदर्शों की महागाथा हैं
उनकी हर पंक्ति को
उद्धरण की तरह दोहराया जा सकता है
वे लय के महाकाव्य हैं
उनके जीवन-छन्द को
सामगान की तरह गाया जा सकता है
उन्होंने स्वयं सूर्य के सारथी से
नियमितता का मन्त्र लिया है
उन्हें वाणी और विनायक दोनों ने
अपना आशीर्वाद दिया है

उनका कहना है– आस्था के हाथ में मशाल होनी चाहिए
और सत्य के हाथ में होनी चाहिए तलवार
जहां सक्रिय हैं– असत्य अनाचार और वंचना
ठीक वहीं पर होना चाहिए वार

वे अब नहीं हैं–  परन्तु वह विश्वास
जो उन्होंने मन की क्यारी में बोया है, उगेगा
दीप जो उन्होंने जगाया है, ज्योति-छन्द बुनेगा
और वह बात जो उन्होंने समझायी है –
जमाना बहुत गौर से सुनेगा
बहुत सावधानी से गुनेगा

समय अवसाद का नहीं
आत्मनिरीक्षण का है
व्यक्तित्व के परीक्षण का है
बोये गए बीज़ों के अंकुरण का है
समय किसी अन्य उपलब्धि का नहीं
प्राप्त आदर्शों के पुनर्वितरण का है

यह भ्रम है कि वे अब
गुमनामी के अंधेरों में खो जायेंगे
अभी वे ज्योति पुंज थे     ज्ञानदीप थे
अब वे ध्रुवतारा हो जायेंगे
हर दिशाभ्रमित नाविक को
रास्ता दिखायेंगे
हर डगमगाते कदम को 
फिसलने से बचायेंगे
 
साथियो !
जो थे,   वे भी नहीं रहे
जो हैं,   वे भी नहीं रहेंगे
पर हम सब मिलकर
एक बात जरूर कहेंगे–
कि यही वो कर्मभूमि है
जहां वे उम्र की एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए
आदर्श के अनूठे प्रतिमान गढ़ते रहे
हम सब आगे     और आगे बढ़ते रहे
किन्तु वे अनवरत –  आंधियारों के खिलाफ़
एक छापामार लड़ाई लड़ते रहे ।

 

      ********

 

November 1, 2007

शब्द जो शब्द भर नहीं हैं

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:03 am

Priyankar 

प्रियंकर की एक कविता

 

शब्द जो शब्द भर नहीं है

 

प्यार !
एक बहुउद्धृत शब्द !

यह निरा शब्द ही तो है
जैसे अंक हैं
गणित में ।
 
नहीं !
मैं शब्द के संगीत को
पा नहीं सका था
और अर्थ की सतहों के पार
जा नहीं सका था

शब्द जो बहता है
सदानीरा सा
शब्द जो मचलता है
लय है
शब्द जो अंकुर है
पराजय का
शब्द जो स्वयं ही
जय है

शब्द जो मधुमास को
पुकार लाते हैं
शब्द जो गंध की नदी से
पार आते हैं

शब्द जो  किसी साज से
बज सकें
शब्द जो किसी के होठों पर
सज सकें

शब्द जो दहकता है
पलाश सा
शब्द जो महकता है
गुलाब सा

शब्द चाहिए जिसे –
उपयुक्त माध्यम
उपयुक्त समय
शब्द चाहिए जिसे –
उपयुक्त श्रोता
उपयुक्त जगह

जहां से शब्द
किसी हरसिंगार सा
झर सके
और हर शब्द-याचक
अपनी झोली
भर सके 
 
जब तुम पहचान रही थीं
अवसर की उपयुक्तता
मैं वहीं समय के प्रवाह में
पतवार थामे खड़ा था
और ये शब्द प्यार
तुम्हारें होठों पर
मुस्कराहट की तरह जड़ा था
 
तुमने इसे
किसी भी उद्देश्य से कहा हो
मैंने इस शब्द-सुरा को
पूरी तन्मयता से पिया है
सम्भव है –   तुमने फिर
सोचा भी न हो
मैंने तो
पूरी गम्भीरता से जिया है ।

 

      *******
 

 

Blog at WordPress.com.