शब्द जो शब्द भर नहीं हैं
प्रियंकर की एक कविता
शब्द जो शब्द भर नहीं है
प्यार !
एक बहुउद्धृत शब्द !
यह निरा शब्द ही तो है
जैसे अंक हैं
गणित में ।
नहीं !
मैं शब्द के संगीत को
पा नहीं सका था
और अर्थ की सतहों के पार
जा नहीं सका था
शब्द जो बहता है
सदानीरा सा
शब्द जो मचलता है
लय है
शब्द जो अंकुर है
पराजय का
शब्द जो स्वयं ही
जय है
शब्द जो मधुमास को
पुकार लाते हैं
शब्द जो गंध की नदी से
पार आते हैं
शब्द जो किसी साज से
बज सकें
शब्द जो किसी के होठों पर
सज सकें
शब्द जो दहकता है
पलाश सा
शब्द जो महकता है
गुलाब सा
शब्द चाहिए जिसे –
उपयुक्त माध्यम
उपयुक्त समय
शब्द चाहिए जिसे –
उपयुक्त श्रोता
उपयुक्त जगह
जहां से शब्द
किसी हरसिंगार सा
झर सके
और हर शब्द-याचक
अपनी झोली
भर सके
जब तुम पहचान रही थीं
अवसर की उपयुक्तता
मैं वहीं समय के प्रवाह में
पतवार थामे खड़ा था
और ये शब्द प्यार
तुम्हारें होठों पर
मुस्कराहट की तरह जड़ा था
तुमने इसे
किसी भी उद्देश्य से कहा हो
मैंने इस शब्द-सुरा को
पूरी तन्मयता से पिया है
सम्भव है – तुमने फिर
सोचा भी न हो
मैंने तो
पूरी गम्भीरता से जिया है ।
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