स्मृति के शिलालेख
प्रियंकर की एक कविता
स्मृति के शिलालेख
मदन चाचा के लिए
रेत के इस महासमुद्र में
कुछ द्वीप हैं– आस्था के ध्यान के
इस बियाबान रेगिस्तान में
बोधिवृक्ष हैं– सत्य के ज्ञान के
यह सच है कि
उनकी अमरता हेतु अंधकूपों में
कालपात्र नहीं गड़े हैं
पर उनकी कालजयी स्मृतियों के शिलालेख
मन की दराज़ों में जड़े हैं
वे आदर्शों की महागाथा हैं
उनकी हर पंक्ति को
उद्धरण की तरह दोहराया जा सकता है
वे लय के महाकाव्य हैं
उनके जीवन-छन्द को
सामगान की तरह गाया जा सकता है
उन्होंने स्वयं सूर्य के सारथी से
नियमितता का मन्त्र लिया है
उन्हें वाणी और विनायक दोनों ने
अपना आशीर्वाद दिया है
उनका कहना है– आस्था के हाथ में मशाल होनी चाहिए
और सत्य के हाथ में होनी चाहिए तलवार
जहां सक्रिय हैं– असत्य अनाचार और वंचना
ठीक वहीं पर होना चाहिए वार
वे अब नहीं हैं– परन्तु वह विश्वास
जो उन्होंने मन की क्यारी में बोया है, उगेगा
दीप जो उन्होंने जगाया है, ज्योति-छन्द बुनेगा
और वह बात जो उन्होंने समझायी है –
जमाना बहुत गौर से सुनेगा
बहुत सावधानी से गुनेगा
समय अवसाद का नहीं
आत्मनिरीक्षण का है
व्यक्तित्व के परीक्षण का है
बोये गए बीज़ों के अंकुरण का है
समय किसी अन्य उपलब्धि का नहीं
प्राप्त आदर्शों के पुनर्वितरण का है
यह भ्रम है कि वे अब
गुमनामी के अंधेरों में खो जायेंगे
अभी वे ज्योति पुंज थे ज्ञानदीप थे
अब वे ध्रुवतारा हो जायेंगे
हर दिशाभ्रमित नाविक को
रास्ता दिखायेंगे
हर डगमगाते कदम को
फिसलने से बचायेंगे
साथियो !
जो थे, वे भी नहीं रहे
जो हैं, वे भी नहीं रहेंगे
पर हम सब मिलकर
एक बात जरूर कहेंगे–
कि यही वो कर्मभूमि है
जहां वे उम्र की एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए
आदर्श के अनूठे प्रतिमान गढ़ते रहे
हम सब आगे और आगे बढ़ते रहे
किन्तु वे अनवरत – आंधियारों के खिलाफ़
एक छापामार लड़ाई लड़ते रहे ।
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यह भ्रम है कि वे अब
गुमनामी के अंधेरों में खो जायेंगे
अभी वे ज्योति पुंज थे ज्ञानदीप थे
अब वे ध्रुवतारा हो जायेंगे
हर दिशाभ्रमित नाविक को
रास्ता दिखायेंगे
हर डगमगाते कदम को
फिसलने से बचायेंगे
बहुत ही बढ़िया कविता….
Comment by Shiv Kumar Mishra — November 8, 2007 @ 10:40 am
बिलकुल सही । पाश के शब्दों, ‘हम लड़ेंगे,कि अब तक लड़े क्यों नहीं’। अत्यन्त गतिशील कविता।हार्दिक शुभकामना।
Comment by अफ़लातून — November 8, 2007 @ 2:09 pm
अब वे ध्रुवतारा हो जायेंगे
हर दिशाभ्रमित नाविक को
रास्ता दिखायेंगे
हर डगमगाते कदम को
फिसलने से बचायेंगे
–बहुत ही सुन्दर कविता, प्रियंकर भाई. डूब के पढ़ी, फिर फिर पढ़ी. बहुत बधाई.
आप एवं आपके परिवार को दीपावली की शुभकामनाएं।
Comment by समीर लाल — November 8, 2007 @ 2:21 pm
बहुत ही सुन्दर कविता।
आप एवं आपके परिवार को दीपावली की शुभकामनाएं।
Comment by Beji — November 8, 2007 @ 2:31 pm
प्रियंकर जी, सचमुच सच्चाई की थाप पर शब्दों और भावों की ऐसी शानदार जुगलबंदी बहुत कम देखने को मिलती हैं। गजब लिखते हैं आप। शब्दों की ये साधना कैसे कर ले जाते हैं?
Comment by अनिल रघुराज — November 8, 2007 @ 4:20 pm
चलो जी, आज ‘हम’ हैं; कल हम ‘वे’ बनेंगे शायद! अगर समय ने तपाया हमें तो।
यह ट्रांसफॉर्मेशन कैसे होता है?
Comment by ज्ञानदत्त पाण्डेय — November 9, 2007 @ 5:48 am
बहुत सटीक,बहुत ही सुन्दर कविता। बधाईयाँ !
तम से मुक्ति का पर्व दीपावली आपके पारिवारिक जीवन में शांति , सुख , समृद्धि का सृजन करे ,दीपावली की ढेर सारी बधाईयाँ !
Comment by ravindra.prabhat — November 9, 2007 @ 6:12 am
कुछ कुछ शब्द हमारे लिये मुश्किल थे लेकिन कविता सुन्दर है, भाव भी।
Comment by Tarun — November 19, 2007 @ 4:29 am