एक जूतोन्मुखी कविता
सागर जैसे उन्मुक्त मन …….
“सागर जैसे उन्मुक्त मन
आकाश जैसी असीमित कल्पना
पवन जैसी प्रचंड साहसी और
पृथ्वी जैसी अविचल आत्मा वाले महानुभावों के लिए
उपलब्ध है वुडलैंड का जूता”
विश्वहाट की जय हो भैया
कस के पैसा सूंता
जीवन शैली बदल रही है
बदल रहा परिवेश
किसकी भाषा कैसी संस्कृति
बेच खाएंगे देश ।
– प्रियंकर
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कविता की पहली पांच पंक्तियां जूते के एक विज्ञापन का अनुवाद हैं. क्या आपको भी यह शब्द और अर्थ का अवमूल्यन लगता है ?