अनहद नाद

February 12, 2008

ठंडी आलमारी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:49 am

मानिक बच्छावत की एक कविता

 

ठंडी आलमारी

 

उन्होंने खरीद ली है

ठंडी आलमारी

बूढे-बच्चे खुश

खूब खाने को मिलेगी बरफ

जब चाहेंगे निकालकर

पिएंगे ठंडा पेय

और सारा सामान

सुरक्षित अलग से

 

सिर्फ उदास है

घर की मेहरिन

अब उसे बचा-खुचा भी

नहीं मिलेगा खाने को ।

 

*****

 

(काव्य संकलन ‘पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार)

 

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