ठंडी आलमारी
मानिक बच्छावत की एक कविता
ठंडी आलमारी
उन्होंने खरीद ली है
ठंडी आलमारी
बूढे-बच्चे खुश
खूब खाने को मिलेगी बरफ
जब चाहेंगे निकालकर
पिएंगे ठंडा पेय
और सारा सामान
सुरक्षित अलग से
सिर्फ उदास है
घर की मेहरिन
अब उसे बचा-खुचा भी
नहीं मिलेगा खाने को ।
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(काव्य संकलन ‘पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार)