Posted by: PRIYANKAR | February 13, 2008

मेरी कथा

 लीलाधर जगूड़ी

 लीलाधर जगूड़ी की एक कविता

 

मेरी कथा

 

मेरी कथा

फावड़ा घिस जाने की

कारखाना उजड़ जाने की

सड़क टूट जाने की कथा है

 

मेरी कथा

पत्थर के रेत हो जाने की

पेड़ के

लकड़ी हो जाने की

कोयले के

आग हो जाने की कथा है

 

मेरी कथा

जाने हो जाने की कथा है ।

 

********

 

(काव्य संकलन ‘बची हुई पृथ्वी’ से साभार)

 


Responses

  1. यह क्या? घिसने/टूटने/कोयला/राख होने पर ही तो नया बनता है।
    झरते हैं झरने दो पत्ते डरो न किंचित
    रक्त पूर्ण मांसल होंगे फिर जीवन रंजित।

  2. हूं. अच्‍छा है.

  3. kavita men vyatha hai
    vyatha ki katha hai.
    khoob.


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