
लीलाधर जगूड़ी की एक कविता
मेरी कथा
मेरी कथा
फावड़ा घिस जाने की
कारखाना उजड़ जाने की
सड़क टूट जाने की कथा है
मेरी कथा
पत्थर के रेत हो जाने की
पेड़ के
लकड़ी हो जाने की
कोयले के
आग हो जाने की कथा है
मेरी कथा
जाने हो जाने की कथा है ।
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(काव्य संकलन ‘बची हुई पृथ्वी’ से साभार)
यह क्या? घिसने/टूटने/कोयला/राख होने पर ही तो नया बनता है।
झरते हैं झरने दो पत्ते डरो न किंचित
रक्त पूर्ण मांसल होंगे फिर जीवन रंजित।
By: ज्ञानदत्त पाण्डेय on February 13, 2008
at 1:35 pm
हूं. अच्छा है.
By: प्रमोद सिंह on February 13, 2008
at 2:59 pm
kavita men vyatha hai
vyatha ki katha hai.
khoob.
By: arun aditya on March 13, 2008
at 3:40 am