अनहद नाद

March 13, 2008

दुनिया की सबसे शानदार कविता

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:13 pm

 महेन्द्र सिंह पूनिया की एक कविता

 

दुनिया की सबसे शानदार कविता

 

दुनिया की सबसे शानदार कविता

कलम से नहीं

हल की नोक से लिखी जाती है

दुनिया की सबसे शानदार कविता

मंडी हाउस में बैठनेवाला दलाल नहीं

लालटेन की रौशनी में

कसीदा काढ़नेवाली

सलमा लिखती है

दुनिया की सबसे शानदार कविता

स्याही से नहीं

सड़क पर पत्थर कूटती

रामरती के

पसीने से लिखी जाती है

दुनिया की सबसे शानदार कविता

चरवाहों के पैरों से

थार के सीने पर लिखी जाती है

दुनिया की सबसे शानदार कविता

अजायबघर से सजे बैठकखानों में नहीं

गिरिडीह की

कोयला-खदानों में लिखी जाती है

 

दुनिया की सबसे शानदार कविता का पाठ

वातानुकूलित सभागारों में नहीं

उन्मुक्त चांदनी रात में

खेत की मेंड़ पर होता है।

 

*****

 

11 Comments »

  1. Bahut Khub …

    Comment by Prakash Khandelwal — March 13, 2008 @ 6:46 pm

  2. काश कि ऐसा हुआ करता हो.. शानदार न सही.. कविता का ही होता हो..

    Comment by प्रमोद सिंह — March 13, 2008 @ 6:47 pm

  3. sandar kavita hai. maja aa gaya….lekin giridih ki jagaha yadi dhanbad hota to or bhi maja aata.

    Comment by ravikant ojha — March 13, 2008 @ 7:14 pm

  4. सही है-
    दुनियाँ की सब से शानदार कृति
    मानव श्रम से सिरजी जाती है।
    दुनियां की सारी कृतियां सिरजी जाती हैं
    श्रम से ही, केवल और केवल श्रम से ही।

    Comment by दिनेशराय द्विवेदी — March 13, 2008 @ 7:45 pm

  5. बिलकुल सही कहा है इस कविता ने ….अच्छा लगा …बधाई

    Comment by reetesh gupta — March 13, 2008 @ 7:47 pm

  6. शानदार कविता । शुक्रिया पढ़वाने का। आपको शायद ताज्जुब होगा , मंडी हाऊस वाले जिन साहब का इसमें उल्लेख है , उन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। उनके कई कविता संकलन निकल चुके हैं:)का करें, जमाने की हवा लग गई :(

    Comment by अजित वडनेरकर — March 13, 2008 @ 11:26 pm

  7. जिगर तक उतर गई

    Comment by maithily — March 14, 2008 @ 2:22 am

  8. श्रम की महत्ता का शानदार गुणगान .

    Comment by रोमी — March 14, 2008 @ 3:12 am

  9. बहुत बढ़िया कविता…

    Comment by Shiv Kumar Mishra — March 14, 2008 @ 12:34 pm

  10. कविता निस्संदेह शानदार है। लेकिन भरत नाट्यम की कला मजदूरों में नहीं पनपती। नई टेक्नोलॉजी कारखानों में काम करनेवाले मजदूर नहीं बनाते। कहने का मतलब आप समझ ही गए होंगे।

    Comment by अनिल रघुराज — March 14, 2008 @ 12:46 pm

  11. Adaab
    Many thanks for visiting my blog and inviting me to your treasure of poetry
    Unfortunately I cannot read Hindi - what a shame!
    But I am sure that this is a fine place for those who love the arts and the poetry

    Comment by Raza Rumi — March 18, 2008 @ 12:30 pm

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