अनहद नाद

April 30, 2008

कुछेक कवि बगैर पैसे के डॉक्टरी कर रहे हैं

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 5:37 am

नवारुण भट्टाचार्य की एक बांग्ला कविता

 (हिंदी अनुवाद : अरविंद चतुर्वेद)

 

क्रांति के बिम्ब

 

कुछेक कवि बगैर पैसे के डॉक्टरी कर रहे हैं

चांद पर छलांग लगाने से पहले प्रेमी गिरफ़्तार

पुलिस की गाड़ियां चौबीस घंटे के भीतर

स्कूल-बसों में तब्दील कर दी जाएंगी

 

आधी रात को जनविरोधी पार्टियों की लाइन

उखाड़ फेंकी जा रही है

 

लेटरबॉक्स में चिड़ियों के घोंसला बना लेने से काम ठप

किसी सिद्धांतकार ने एक्वेरियम में बिल्ली पाली है

रेडियो कोई नहीं बजाता क्योंकि नेताओं के भाषण सुनना

अच्छा नहीं लग रहा है

 

बहस हो रही है पौधों और नन्हीं मछलियों पर

उदास संगीत के प्रभाव को लेकर

 

अब आंसुओं से ही चलेंगी मोटर गाड़ियां

मजदूरों का नाटक करने वाले मजदूरों के हाथों परेशान

कौन कह सकता है समस्या नहीं है हमारी इस नई व्यवस्था में

क्या ऐसा ही लगता है समाचार सुनने के बाद ?

 

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( समीर रायचौधुरी द्वारा सम्पादित पत्रिका  हवा ४९  के ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ अंक से साभार)

 

April 25, 2008

भोर का तारा

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 11:39 am

मानिक बच्छावत की एक कविता

 

भोर का तारा

 

यह नीला आसमान है

और दूर कहीं उगा है

वह तारा

भोर होने में अभी देर है

तेजस्वी लग रहा है वह तारा

 

पूरब से छिटक रहा है उजाला

और नीला आसमान झिलमिलाने लगा है

सूर्य के स्वागत में

 

सूर्य निकलेगा

थोड़ी देर में पूरा आसमान

भर जाएगा गर्म उजाले से

तारा खो जाएगा

 

लेकिन सांझ के बाद

जब थका-हारा सूर्य सो जाएगा

उसे जगाने आएगा

भोर का यही तेजस्वी तारा ।

 

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( काव्य संकलन ‘पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार )

 

April 24, 2008

तुम्हारी चुप्पी में

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 4:48 am

जितेन्द्र श्रीवास्तव की एक कविता

 

तुम्हारी चुप्पी में

 

चुप रहो

बस चुप रहो

यह रात की धुन है

इसे यूं ही बजने दो

 

आहिस्ता चलो

इस बेला में

समय को मौन का उपहार दो

 

रात के इस राग में

झींगुर विसर्जित कर रहा है

अपना राग

 

यह विलाप नहीं

फिर भी

कुएं की उदासी

आंकी जा सकती है इस आवाज में

 

यह रात की धुन है

इसे यूं ही बजने दो

और ताक सको जितनी दूर

ताको चांदनी में

 

छू सको तो छू लो उसे

त्वचा की तरह

पर चुप रहो

 

तुम्हारी इस चुप्पी में

दूसरे के अस्तित्व का सम्मान है ।

 

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कवि परिचय :  ‘अनभै कथा’ के युवा कवि . इग्नू में प्राध्यापक . भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित .

 

April 22, 2008

गज़ल के रंग में / अजंता देव

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 6:04 am

( अजंता देव की सद्यप्रकाशित काव्य-पुस्तिका ‘एक नगरवधु की आत्मकथा’ से साभार . अनुसृजन का आभास देती यह काव्य-पुस्तिका सृजन का ऐसा अनुपम उदाहरण है जो तथाकथित (सतही) मौलिकता से कहीं लाख गुना बेहतर  है . देशज काव्य-परंपरा की अद्भुत अनुगूंज अपने में समोए इस संकलन की कविताओं में आपको भर्तृहरि, अमीर खुसरो, गालिब, नज़ीर यहां तक कि राजकमल चौधरी तक  की काव्य-भाषा के रचनात्मक छींटे और अकुंठ संदर्भ मिलेंगे . और वह काव्य-संगीत मिलेगा जो  वैदिक-औपनिषदिक छंदों और हमारी सामासिक संस्कृति — हमारी गंगा-जमनी तहजीब — से लेकर हमारे लोकगीतों तक में व्याप्त है . यह वह काव्य-परम्परा है जिसके तहत भारत का एक सामान्य चरवाहा भी ‘प्यारे मन की गठरी खोल , जिसमें लाल भरे अनमोल’  जैसा लोकगीत गाकर अन्ततः परम्परा-प्रदत्त औपनिषदिक दर्शन का ही गायन करता है .  इसमें वह सहजता है जो विद्वानों के दर्शन को लोक के जीवन-दर्शन में ढाल देती है .  इस काव्य-संकलन  का मितकथन  और इसकी  सूत्रात्मक शैली  –  ‘एपीग्रैमैटिक स्टाइल’  –  अभिव्यक्ति को और  अधिक  प्रभावकारी बना देती है .  लोक और शास्त्र इस काव्य संकलन की दो आंखें हैं .  –  प्रियंकर )

 

गज़ल के रंग में

 

रात अंधेरी    तारे गुम

इस पल सबसे प्यारे तुम ।

 

जितना हमसे दूर हुए

उतने हुए हमारे तुम ।

 

घास  फूल चिड़िया  आकाश

सबमें   नदी किनारे  तुम ।

 

अनजाने में   जीत गए

जानबूझ कर हारे तुम । 

 

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा

मेरे पंज पियारे तुम ।

 

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April 16, 2008

रोटी का सवाल

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 10:37 am

( कोटा निवासी महेन्द्र नेह अत्यंत सरस गीतकार हैं . एक-दो बार उनके गीत सुनने का मौका मिला है . प्रस्तुत गीत जो मेरे पसंदीदा गीतों में शामिल है, अभिव्यक्ति (सं०-शिवराम) द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका से लिया गया है . ‘अनवरत’ और ‘तीसरा खंबा’ नामक  चिट्ठों पर अपनी बात रखने वाले विधिवेत्ता ब्लॉगर  दिनेशराय द्विवेदी के अभिन्न मित्र हैं महेन्द्र नेह और शिवराम  )

 

महेन्द्र नेह का एक जनगीत

 

रोटी का सवाल

 

रोटी का सवाल भैया रोटी का सवाल

लाखों-लाख करोड़ों भूखे-नंगों का सवाल

तेरा भी सवाल है ये मेरा भी सवाल

 

तेरे घर में सूखी रोटी, मेरे घर में फ़ाका

तेरे घर में सेंध लगी तो मेरे घर में डाका

मैं भी फटेहाल भैया तू भी फटेहाल ॥१॥

 

तुझको मारा खुली सड़क पर, मुझको गलियारे में

तुझको मारा भिनसारे में, मुझको अंधियारे में

जीना है मुहाल मेरा, तेरा भी मुहाल ॥२॥

 

तू चक्की में पिसा, दबा मैं ज़ालिम चट्टानों में

तू लहरों में फंसा हुआ, मैं पागल तूफ़ानों में

मैं थामूं पतवारें, थोड़ी तू भी झोंक संभाल ॥३॥

 

तुझ पर चली खेत में गोली, मुझ पर मिल हाते में

दोनों नाम लिखे मंडी के बनिये के खाते में

तू भी हुआ हलाल प्यारे मैं भी हुआ हलाल ॥४॥

 

तेरी भवें तनी, आंखों में मेरी भी अंगारे

तू भी काट गुलामी, मैं भी तोड़ूं बंधन सारे

मैंने लिया हथौड़ा साथी, तू भी उठा कुदाल ॥५॥

 

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