गज़ल के रंग में / अजंता देव
( अजंता देव की सद्यप्रकाशित काव्य-पुस्तिका ‘एक नगरवधु की आत्मकथा’ से साभार . अनुसृजन का आभास देती यह काव्य-पुस्तिका सृजन का ऐसा अनुपम उदाहरण है जो तथाकथित (सतही) मौलिकता से कहीं लाख गुना बेहतर है . देशज काव्य-परंपरा की अद्भुत अनुगूंज अपने में समोए इस संकलन की कविताओं में आपको भर्तृहरि, अमीर खुसरो, गालिब, नज़ीर यहां तक कि राजकमल चौधरी तक की काव्य-भाषा के रचनात्मक छींटे और अकुंठ संदर्भ मिलेंगे . और वह काव्य-संगीत मिलेगा जो वैदिक-औपनिषदिक छंदों और हमारी सामासिक संस्कृति — हमारी गंगा-जमनी तहजीब — से लेकर हमारे लोकगीतों तक में व्याप्त है . यह वह काव्य-परम्परा है जिसके तहत भारत का एक सामान्य चरवाहा भी ‘प्यारे मन की गठरी खोल , जिसमें लाल भरे अनमोल’ जैसा लोकगीत गाकर अन्ततः परम्परा-प्रदत्त औपनिषदिक दर्शन का ही गायन करता है . इसमें वह सहजता है जो विद्वानों के दर्शन को लोक के जीवन-दर्शन में ढाल देती है . इस काव्य-संकलन का मितकथन और इसकी सूत्रात्मक शैली – ‘एपीग्रैमैटिक स्टाइल’ – अभिव्यक्ति को और अधिक प्रभावकारी बना देती है . लोक और शास्त्र इस काव्य संकलन की दो आंखें हैं . – प्रियंकर )
गज़ल के रंग में
रात अंधेरी तारे गुम
इस पल सबसे प्यारे तुम ।
जितना हमसे दूर हुए
उतने हुए हमारे तुम ।
घास फूल चिड़िया आकाश
सबमें नदी किनारे तुम ।
अनजाने में जीत गए
जानबूझ कर हारे तुम ।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा
मेरे पंज पियारे तुम ।
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