अनहद नाद

April 22, 2008

गज़ल के रंग में / अजंता देव

Filed under: कविताएं/Poems — Tags: — PRIYANKAR @ 6:04 am

( अजंता देव की सद्यप्रकाशित काव्य-पुस्तिका ‘एक नगरवधु की आत्मकथा’ से साभार . अनुसृजन का आभास देती यह काव्य-पुस्तिका सृजन का ऐसा अनुपम उदाहरण है जो तथाकथित (सतही) मौलिकता से कहीं लाख गुना बेहतर  है . देशज काव्य-परंपरा की अद्भुत अनुगूंज अपने में समोए इस संकलन की कविताओं में आपको भर्तृहरि, अमीर खुसरो, गालिब, नज़ीर यहां तक कि राजकमल चौधरी तक  की काव्य-भाषा के रचनात्मक छींटे और अकुंठ संदर्भ मिलेंगे . और वह काव्य-संगीत मिलेगा जो  वैदिक-औपनिषदिक छंदों और हमारी सामासिक संस्कृति — हमारी गंगा-जमनी तहजीब — से लेकर हमारे लोकगीतों तक में व्याप्त है . यह वह काव्य-परम्परा है जिसके तहत भारत का एक सामान्य चरवाहा भी ‘प्यारे मन की गठरी खोल , जिसमें लाल भरे अनमोल’  जैसा लोकगीत गाकर अन्ततः परम्परा-प्रदत्त औपनिषदिक दर्शन का ही गायन करता है .  इसमें वह सहजता है जो विद्वानों के दर्शन को लोक के जीवन-दर्शन में ढाल देती है .  इस काव्य-संकलन  का मितकथन  और इसकी  सूत्रात्मक शैली  –  ‘एपीग्रैमैटिक स्टाइल’  –  अभिव्यक्ति को और  अधिक  प्रभावकारी बना देती है .  लोक और शास्त्र इस काव्य संकलन की दो आंखें हैं .  –  प्रियंकर )

 

गज़ल के रंग में

 

रात अंधेरी    तारे गुम

इस पल सबसे प्यारे तुम ।

 

जितना हमसे दूर हुए

उतने हुए हमारे तुम ।

 

घास  फूल चिड़िया  आकाश

सबमें   नदी किनारे  तुम ।

 

अनजाने में   जीत गए

जानबूझ कर हारे तुम । 

 

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा

मेरे पंज पियारे तुम ।

 

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