भोर का तारा
मानिक बच्छावत की एक कविता
भोर का तारा
यह नीला आसमान है
और दूर कहीं उगा है
वह तारा
भोर होने में अभी देर है
तेजस्वी लग रहा है वह तारा
पूरब से छिटक रहा है उजाला
और नीला आसमान झिलमिलाने लगा है
सूर्य के स्वागत में
सूर्य निकलेगा
थोड़ी देर में पूरा आसमान
भर जाएगा गर्म उजाले से
तारा खो जाएगा
लेकिन सांझ के बाद
जब थका-हारा सूर्य सो जाएगा
उसे जगाने आएगा
भोर का यही तेजस्वी तारा ।
*******
( काव्य संकलन ‘पीड़ित चेहरों का मर्म’ से साभार )
priyankar ji khoob hai.
Comment by विजय गौड — April 25, 2008 @ 1:17 pm
bahut sundar kavita hai
Comment by mehek — April 25, 2008 @ 2:09 pm
कविता सुन्दर है, इसे पढ़ कर एक राजस्थानी गीतकार का गीत याद रहा है। “भोर का तारा उगा है, नीन्द की साँकळ उतारो, किरन देहरी पर खड़ी है, जाग जाने की घड़ी है।”
Comment by दिनेशराय द्विवेदी — April 25, 2008 @ 7:17 pm
सुकुआ बचपन से ही मेस्मराइज करता रहा है। और यह पोस्ट भी वही कर रही है।
Comment by ज्ञानदत्त पाण्डेय — April 26, 2008 @ 2:34 am