अनहद नाद

May 1, 2008

धूप

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जितेन्द्र श्रीवास्तव की एक कविता

 

धूप

 

धूप किताबों के ऊपर है

या

भीतर कहीं उसमें

कहना

मुश्किल है इस समय

 

इस समय मुश्किल है

कहना

कि किताबें नहा रही हैं धूप में

या धूप किताबों में 

 

पर यह देखना और महसूसना

नहीं मुश्किल

कि मुस्कुरा रही हैं किताबें

धूप की तरह

और धूप गरमा रही है

किताबों की तरह ।

 

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