स्वागत में

( 1913-1985 )
भवानीप्रसाद मिश्र की एक कविता
स्वागत में
मन में
जगह है जितनी
उस सब में मैंने
फूल की
पंखुरियां
बिछा दी हैं यों
कि जो कुछ
मन में आए
मन उसे
फूल की पंखुरियों पर
सुलाए !
****

( 1913-1985 )
भवानीप्रसाद मिश्र की एक कविता
स्वागत में
मन में
जगह है जितनी
उस सब में मैंने
फूल की
पंखुरियां
बिछा दी हैं यों
कि जो कुछ
मन में आए
मन उसे
फूल की पंखुरियों पर
सुलाए !
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कि जो कुछ
मन में आए
मन उसे
फूल की पंखुरियों पर
सुलाए !
मिश्र जी की इतनी सुन्दर कविता से परिचित कराने का आभार..
***राजीव रंजन प्रसाद
Comment by राजीव रंजन प्रसाद — May 2, 2008 @ 9:17 am
आपका और केडिया जी का आभार ।
Comment by अफ़लातून — May 2, 2008 @ 9:44 am
बहुत सुन्दर प्रियंकर जी।
जब आपसे मिलूंगा तो भवानी प्रसाद मिश्र जी की ढ़ेरों कवितायें झटकूंगा।
Comment by Gyan Dutt Pandey — May 2, 2008 @ 11:00 am
हम तो पहले भी कई बार कह चुके हैं कि भवानी दादा हमारे प्रिय कवि हैं ।
उनकी हर कविता हमें प्रिय है ।
Comment by यूनुस — May 2, 2008 @ 1:20 pm
बहुत प्यारी बात!
Comment by अभय तिवारी — May 2, 2008 @ 2:47 pm
भवानी प्रसाद मिश्र जी की कविता पढ़कर आनन्द आ गया. आभार प्रस्तुत करने का.
Comment by समीर लाल — May 2, 2008 @ 4:05 pm
बहुत गहरी बात… बहुत सरल शब्दों में…..एक अच्छी कविता प्रस्तुत करने लिए हार्दिक आभार….
Comment by ramadwivedi — May 3, 2008 @ 9:20 am