कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं
रतन बिश्वास की बांग्ला कविता
सफ़ेद झूठ
कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं
जिसने पहली बार झूठ बोला होगा
शायद वह भी एक कवि था
प्रश्न यह नहीं है कि पहला झूठ किसी
पुरुष ने बोला या नारी ने
बल्कि यह सवाल अवश्य उठ सकता है
कि पहला झूठ क्षुधा के लिए था, प्रेम के लिए या डींग हांकने के लिए
एक बाघ से मुठभेड़ का बखान था या किसी नये फल वाले जंगल की खोज
या सिर्फ़ आग या चक्के जैसा मनुष्य का एक और आदिम आविष्कार
यह सफ़ेद झूठ
पर लोग बदलते गए कौए के घोंसले से नन्हीं कोयल की मां को पहली पुकार देखकर
प्रकृति में पेड़-पौधों और प्राणियों के कैमोफ़्लेज़ से पुलकित
तरह तरह के छद्मावरण ……
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( हवा ४९ पत्रिका के ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ अंक से साभार,बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर )