Posted by: PRIYANKAR | May 5, 2008

कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं

रतन बिश्वास की बांग्ला कविता

 

सफ़ेद झूठ

 

कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं

 

जिसने पहली बार झूठ बोला होगा

शायद वह भी एक कवि था

प्रश्न यह नहीं है कि पहला झूठ किसी

पुरुष ने बोला  या नारी ने

बल्कि यह सवाल अवश्य उठ सकता है

कि पहला झूठ क्षुधा के लिए था, प्रेम के लिए या डींग हांकने के लिए

एक बाघ से मुठभेड़ का बखान था या किसी नये फल वाले जंगल की खोज

या सिर्फ़ आग या चक्के जैसा मनुष्य का एक और आदिम आविष्कार

यह सफ़ेद झूठ

 

पर लोग बदलते गए कौए के घोंसले से नन्हीं कोयल की मां को पहली पुकार देखकर

प्रकृति में पेड़-पौधों और प्राणियों के कैमोफ़्लेज़ से पुलकित

तरह तरह के छद्मावरण ……

 

*******

 

हवा ४९ पत्रिका के ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ अंक से साभार,बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर )

 


Responses

  1. प्रियंकर जी कभी कभी लगता है यह इतनी सपाट बात भी कितनी गहराई लिए हुए है तो कभी लगता है कि सपाट बातो में ही गहराई होती है. बड़ी अच्छी कविता

  2. वाह प्रियंकर जी!! आभार इस कविता से परिचित कराने के लिये।

    ***राजीव रंजन प्रसाद
    http://www.rajeevnhpc.blogspot.com

  3. बहुत गहरी और उम्दा…. एक अर्थपूर्ण कविता..पढ़ कर लगा कि कविताई में कितना दम है
    कितना विस्तार समाया है…इन चन्द लाईनों में…धन्यवाद

  4. सही कहा आपने। मुख्य यह है कि आपके झूठ या सच बोलने में भावना कैसी है।

  5. सुन्दर है. कविता भी और अनुवाद भी.

  6. अच्छी और सुंदर कविता। और आज फॉयरफॉक्स 3 बीटा 3 में सही पढ़ने में आय़ी, या आप ने कुछ किया।

  7. बेहतरीन रचना- बहुत आभार.

  8. bahut sundar

  9. bahut hi sundar kvita.badhyi swikaren..

  10. kabhi kabhi kyuon? aksar! pakda nahin jata, isliye kabhi- kabhi! jhoot na ho to jindagi hi kya? jindagi ka to maja hi bhag jaye. On your mark ready steady go!


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