कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं
रतन बिश्वास की बांग्ला कविता
सफ़ेद झूठ
कभी कभी मैं तुमसे भी झूठ बोलता हूं
जिसने पहली बार झूठ बोला होगा
शायद वह भी एक कवि था
प्रश्न यह नहीं है कि पहला झूठ किसी
पुरुष ने बोला या नारी ने
बल्कि यह सवाल अवश्य उठ सकता है
कि पहला झूठ क्षुधा के लिए था, प्रेम के लिए या डींग हांकने के लिए
एक बाघ से मुठभेड़ का बखान था या किसी नये फल वाले जंगल की खोज
या सिर्फ़ आग या चक्के जैसा मनुष्य का एक और आदिम आविष्कार
यह सफ़ेद झूठ
पर लोग बदलते गए कौए के घोंसले से नन्हीं कोयल की मां को पहली पुकार देखकर
प्रकृति में पेड़-पौधों और प्राणियों के कैमोफ़्लेज़ से पुलकित
तरह तरह के छद्मावरण ……
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( हवा ४९ पत्रिका के ‘अधुनांतिक बांग्ला कविता’ अंक से साभार,बांग्ला से अनुवाद : प्रियंकर )
प्रियंकर जी कभी कभी लगता है यह इतनी सपाट बात भी कितनी गहराई लिए हुए है तो कभी लगता है कि सपाट बातो में ही गहराई होती है. बड़ी अच्छी कविता
Comment by Rajesh Roshan — May 5, 2008 @ 9:58 am
वाह प्रियंकर जी!! आभार इस कविता से परिचित कराने के लिये।
***राजीव रंजन प्रसाद
http://www.rajeevnhpc.blogspot.com
Comment by राजीव रंजन प्रसाद — May 5, 2008 @ 10:51 am
बहुत गहरी और उम्दा…. एक अर्थपूर्ण कविता..पढ़ कर लगा कि कविताई में कितना दम है
कितना विस्तार समाया है…इन चन्द लाईनों में…धन्यवाद
Comment by vimal verma — May 5, 2008 @ 11:13 am
सही कहा आपने। मुख्य यह है कि आपके झूठ या सच बोलने में भावना कैसी है।
Comment by shobha — May 5, 2008 @ 11:45 am
सुन्दर है. कविता भी और अनुवाद भी.
Comment by विजय गौड — May 5, 2008 @ 12:41 pm
अच्छी और सुंदर कविता। और आज फॉयरफॉक्स 3 बीटा 3 में सही पढ़ने में आय़ी, या आप ने कुछ किया।
Comment by दिनेशराय द्विवेदी — May 5, 2008 @ 5:33 pm
बेहतरीन रचना- बहुत आभार.
Comment by समीर लाल — May 6, 2008 @ 12:35 am
bahut sundar
Comment by mehek — May 6, 2008 @ 6:08 am
bahut hi sundar kvita.badhyi swikaren..
Comment by lovely kumari — May 6, 2008 @ 8:46 am
kabhi kabhi kyuon? aksar! pakda nahin jata, isliye kabhi- kabhi! jhoot na ho to jindagi hi kya? jindagi ka to maja hi bhag jaye. On your mark ready steady go!
Comment by nisha — May 6, 2008 @ 9:19 am