अनहद नाद

May 6, 2008

कुंभनदास गए रजधानी

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देवव्रत जोशी का एक गीत/नवगीत

 

कुंभनदास

 

कुंभनदास गए रजधानी ।

 

खूब लिखा औ नाम कमाया

दाम नहीं   जीवन में   पाया

राजाजी   ने   अब  बुलवाया

भारी मन, जाने की ठानी ।

 

कुंभन   पहुंचे   पैयां-पैयां

देखा   चोखा     रूप-रुपैया

लेकिन कहां आ गए भैया

यहां नहीं मिलता  गुड़-धानी ।

 

‘धत्तेरे की’  कह कर   लौटे

लोग यहां के सिक्के खोटे

बिन पैंदे के  हैं सब लोटे

जमना है पर खारा पानी ।

 

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( वागर्थ के जनवरी २००२ अंक से साभार )

 

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