कुंभनदास गए रजधानी
देवव्रत जोशी का एक गीत/नवगीत
कुंभनदास
कुंभनदास गए रजधानी ।
खूब लिखा औ नाम कमाया
दाम नहीं जीवन में पाया
राजाजी ने अब बुलवाया
भारी मन, जाने की ठानी ।
कुंभन पहुंचे पैयां-पैयां
देखा चोखा रूप-रुपैया
लेकिन कहां आ गए भैया
यहां नहीं मिलता गुड़-धानी ।
‘धत्तेरे की’ कह कर लौटे
लोग यहां के सिक्के खोटे
बिन पैंदे के हैं सब लोटे
जमना है पर खारा पानी ।
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( वागर्थ के जनवरी २००२ अंक से साभार )