अनहद नाद

May 6, 2008

कुंभनदास गए रजधानी

Filed under: Uncategorized — PRIYANKAR @ 7:35 am

देवव्रत जोशी का एक गीत/नवगीत

 

कुंभनदास

 

कुंभनदास गए रजधानी ।

 

खूब लिखा औ नाम कमाया

दाम नहीं   जीवन में   पाया

राजाजी   ने   अब  बुलवाया

भारी मन, जाने की ठानी ।

 

कुंभन   पहुंचे   पैयां-पैयां

देखा   चोखा     रूप-रुपैया

लेकिन कहां आ गए भैया

यहां नहीं मिलता  गुड़-धानी ।

 

‘धत्तेरे की’  कह कर   लौटे

लोग यहां के सिक्के खोटे

बिन पैंदे के  हैं सब लोटे

जमना है पर खारा पानी ।

 

*****

 

( वागर्थ के जनवरी २००२ अंक से साभार )

 

6 Comments »

  1. मजेदार गीत!

    Comment by दिनेशराय द्विवेदी — May 6, 2008 @ 9:32 am

  2. कुम्भन दास गये - और लौट के बुद्धू घर को आये।! हम भी गये थे रजधानी और चोटिल हो कर आये!

    Comment by Gyan Dutt Pandey — May 6, 2008 @ 9:39 am

  3. बढ़िया है.

    Comment by समीर लाल — May 6, 2008 @ 2:24 pm

  4. हमेशा की तरह सुंदर ।

    Comment by यूनुस — May 6, 2008 @ 2:24 pm

  5. आवत-जात पनैह्या टूटी, बिसर गयो हरिनाम.. सन्तन को कहा सीकरी काम?

    Comment by अभय तिवारी — May 7, 2008 @ 4:38 am

  6. vah vaah vaaah, majaa aa gayaa jI

    Comment by arun — May 7, 2008 @ 6:53 am

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